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भावना बर्थवाल

Others


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भावना बर्थवाल

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तर्पण

तर्पण

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तर्पण ‌॥ फिर एक पहल रिश्तों के सम्मान की ओर॥


बुजुर्ग हमारे समाज की धरोहर हैं, उनका सम्मान करें: 

जिस परिवार में बड़े बुजुर्गों का सम्मान नहीं होता उस परिवार में सुख, संतुष्टि और स्वाभिमान नहीं आ सकता। हमारे बड़े बुज़ुर्ग हमारा स्वाभिमान हैं, हमारी धरोहर हैं। हमारा मान सम्मान है। वो है तब हम सब का अस्तित्व है। ये हमें क्या होता जा रहा है। ये किस तरह की हमारी तरक्की हो रही है। जहां हम अपने जड़ों को ही सींचने में असमर्थ हो रहें हैं। आप सोचिए अगर जड़ ही सूख गए तो क्या हम पेड़ की कल्पना कर सकते हैं। कभी नहीं। तो आइए अपने देवता तुल्य बड़ों को उनके कप कंपाती हाथों को उनकी हमें आशा से भरी देखती

निगाहों को अपने हाथों से सँवारे। मत पूजिये देवता मत कराइए कीर्तन-भजन। बस हर हाल में खुश रखिए मां बाप को 

हर दौलत मिल जाएगी। थोड़ा बैठिए पास उनके ज्ञान व अनुभव से भर जाएगी तेरी झोली।


बुजुर्ग अनुभवों का वह खजाना है जो हमें जीवन पथ के कठिन मोड़ पर उचित दिशा निर्देश करते हैं । परिवार के बुजुर्ग लोगों में नाना-नानी, दादा-दादी, माँ-बाप, सास-ससुर आदि आते हैं । ... बुजुर्गों का जीवन अनुभवों से भरा पड़ा है, उन्होंने अपने जीवन में कई धूप-छाँव देखे हैं जितना उनके अनुभवों का लाभ मिल सके लेना चाहिए ।पर हमारी युवा पीढ़ी ऐसा करने मैं कुछ हद तक असफल होती दिख रही है। माना कुछ विचारों में समानता ना हो पर क्या हुआ। हम बैठते हैं ना शाम की चाय पे रात के खाने पे। कुछ उनकी सुनते हैं कुछ अपनी सुनाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे बचपन में सुनाते थे स्कूल से आकर।

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जिस मुकाम पे आज वो है वहीं पे तो खुद भी आना है 

फिर किस बात का गुमान है साहब


आज के युग में रिश्तों का रंग पता नहीं क्यों फिका पड़ता जा रहा है। आज कि पीढ़ी अपने बुजुर्गो को साथ मैं रखना नहीं चाहती। क्या वजह है ठीक से कह नहीं सकते। कहीं पे वो नहीं समझ पाते और कहीं पे हम खुद समझने में असमर्थ पर

क्या इस आधुनिकता की चमक-दमक हम पे इतनी ज्यादा हावी होती जा रही है। कि हम रिश्तों का मान सम्मान भूल से गये है ।

क्या ये सही हो रहा है हम सब को खुद ही इस पे विचार करना होगा शायद तभी ये रिश्तों की बगिया को महकते हुए हम और हमारी आने वाली पीढ़ी देख पायेगी।


एक कोशिश हम करें एक कोशिश आप करें ।

इस जिंदगी के कारवां को क्यों ना खुशियों से 

महका दे फिर देख जिंदगी का एक अलग तराना॥


आओ लेके चले अपनों को एक खुशी और सम्मान की ओर

मुझे हमेशा अपने दादा जी बहुत याद आती हैं।

उन्हीं के साथ बिताए पलों को साझा कर रही हूं।


मैं उत्तराखंड से हूं। हम संयुक्त परिवार में रहते थे । पापा बाहर नौकरी करते थे और मां लोग खेत पे काम करने जाती थी तो बच्चे दादा दादी के साथ ही रहते थे। हम सब बहुत ज्यादा उन से जुड़े रहे और आज भी है। उन के साथ बिताए पलों को याद कर के मन उन सतरंगी पलों में में खो सा जाता है। हमारी हर बात पे हर ज़िद पे वो अपने हाँ की मुहर लगा देते थे।हमारा सारा घर उन पे ही निर्भर रहता था। पर आज कि कुछ पीढ़ी को रास नहीं आता ।

दादी दादा के साथ रहना इसके मेरे हिसाब से बहुत कारण हो सकते हैं। एक कारण ये हो सकता है कि लोगों को अब ज्यादा सुनना और सुनाना अच्छा नहीं लगता है। ये हम सब जानते हैं कि हमारे-आपके बुजुर्ग काफी  अनुभवी होते हैं। अगर उनका साथ और आशीर्वाद मिला तो हम तरक्की ही करेंगे।

अपने बच्चों को संस्कारित करना है तो अपने माता-पिता के साथ रहिये।


सब कुछ बदल सकते हैं, लेकिन पूर्वज नहीं। हम उन्हें छोड़कर इतिहास बोध से कट जाते हैं और इतिहास बोध से कटे समाज जड़ों से टूटे पेड़ जैसे सूख जाते हैं। जिस परिवार में बड़े बुजुर्गों का सम्मान नहीं होता उस परिवार में सुख, संतुष्टि और स्वाभिमान नहीं आ सकता। हमारे बड़े बुज़ुर्ग हमारा स्वाभिमान हैं, हमारी धरोहर हैं। उन्हें सहेजने की जरूरत है। यदि हम परिवार में स्थायी सुख, शांति और समृद्धि चाहते हैं तो परिवार में बुजुर्गों का सम्मान कर।

मैं अपने आप को भाग्यशाली मानती हूं कि मुझे दादी दादा प्यार मिला। और मेरे बच्चों को भी वही प्यार और दुलार मिल रहा है

अपने शब्दों को विराम देते हुए । अपने बुजुर्गो का हमेशा सम्मान का प्रण लेते हुए ।



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