Charumati Ramdas

Children Stories Tragedy Inspirational


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Charumati Ramdas

Children Stories Tragedy Inspirational


तरबूज़ों वाली गली

तरबूज़ों वाली गली

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लेखक: विक्टर द्रागून्स्की

अनुवाद: आ. चारुमति रामदास

 

मैं कम्पाऊण्ड से फुटबॉल खेलकर लौटा. बेहद थका हुआ और न जाने किसके जैसा गन्दा हो रहा था. मैं ख़ुश था, क्योंकि हमने बिल्डिंग नं, 5 से 44:37 पॉइन्ट्स से मैच जीत लिया था. अच्छा हुआ कि बाथरूम में कोई नहीं था मैंने जल्दी से हाथ धोए, कमरे में भागा और मेज़ पे बैठ गया. मैंने कहा:

 “मम्मा, इस समय मैं बैल भी खा सकता हूँ.”

वो मुस्कुराई.

 “ज़िन्दा बैल?” उसने पूछा.

 “आहा,” मैंने कहा, “ज़िन्दा बैल, खुरों और नथुनों के साथ!”

मम्मा फ़ौरन गई और एक सेकण्ड में हाथों में एक प्लेट लेकर आई. प्लेट से वो S भाप निकल रही थी, और मैं फ़ौरन समझ गया कि उसमें अचार है. मम्मा ने प्लेट मेरे सामने रख दी.

 “खा ले!” मम्मा ने कहा.

मगर ये तो नूडल्स थे. दूध वाले. पूरा फ़ेन-फ़ेन. ये क़रीब-क़रीब वो ही चीज़ है, जैसे दलिए का पॉरिज. पॉरिज में ज़रूर गुठलियाँ-गुठलियाँ होती हैं, और नूडल्स में ज़रूर फ़ेन. जैसे ही मैं फ़ेन देखता हूँ, मैं बस, मर जाता हूँ, खाने की बात तो छोड़ ही दो. मैंने कहा:

 “मैं नूडल्स नहीं खाऊँगा!”

मम्मा ने कहा;

 “कोई बहस नहीं!”

”इसमें फ़ेन है!”

मम्मा ने कहा:

 “तू मुझे मार डालेगा! कहाँ है फ़ेन? तू किसके जैसा है? तू एकदम कोश्ची (रूसी लोककथाओं का एक बेहद दुबला-पतला, बूढ़ा पात्र-अनु.) जैसा है!”

मैंने कहा:

 “इससे अच्छा है, कि मुझे मार ही डालो!”

मगर मम्मा एकदम लाल हो गई और मेज़ पर हाथ मारते हुए बोली:

 “तू ही मुझे मारे डाल रहा है!”

तभी पापा अन्दर आए. उन्होंने हमारी तरफ़ देखा और पूछा:

 “किस बात पे झगड़ा हो रहा है? इतनी गरमागरम बहस किसलिए?”

मम्मा ने कहा:

 “फ़रमाइए! नहीं खाना चाहता. लड़का जल्दी ही ग्यारह साल का होने वाला है, और वो, छोटी बच्ची की तरह, नख़रे कर रहा है.”

मैं जल्दी ही नौ साल का होने वाला हूँ. मगर मम्मा हमेशा कहती है, कि मैं जल्दी ही ग्यारह का हो जाऊँगा. जब मैं आठ साल का था, तो वो कहती थी कि मैं जल्दी ही दस का हो जाऊँगा.”

पापा ने कहा:

 “क्यों नहीं खाना चाहता? क्या सूप जल गया है, या उसमें नमक ज़्यादा हो गया है?”

मैंने कहा:

 “ये नूडल्स हैं, और उसमें फ़ेन है...”

पापा ने सिर हिलाया:

 “आह, ये बात है! हिज़ हाईनेस वॉन बैरोन कूत्किन-पूत्किन को दूध वाली नूडल्स नहीं खानी हैं! शायद उन्हें बादाम का हलवा चाहिए, चाँदी की तश्तरी में!”

मैं हँसने लगा, क्योंकि जब पापा मज़ाक करते हैं, तो मुझे बहुत अच्छा लगता है.

 “वो क्या होता है – बादाम का हलवा?”

 “मालूम नहीं,” पापा ने कहा, “शायद कोई मीठी चीज़ होगी और उसमें से यूडीकलोन की ख़ुशबू आती होगी. ख़ास करके वॉन-बैरोन कूत्किन-पूत्किन के लिए बनाई जाती होगी!...चल, खा ले नूडल्स!”

 “मगर फ़ेन है!”

”तूने खूब खा लिया है, ब्रदर, बस, यही बात है!” पापा ने कहा और मम्मा की तरफ़ मुड़े. “उससे नूडल्स वापस ले लो,” उन्होंने कहा, “ मुझे तो बहुत गुस्सा आ रहा है! पॉरिज, उसे नहीं चाहिए, नूडल्स नहीं खा सकता!...नख़रे तो देखो! बर्दाश्त नहीं होता!...”

वो कुर्सी पे बैठ गए और मेरी तरफ़ देखने लगे.  उनका चेहरा ऐसा था, जैसे मैं उनके लिए कोई अजनबी हूँ. वो कुछ नहीं कह रहे थे, बस उसी तरह – अजनबी की तरह देखे जा रहे थे. मैंने फ़ौरन मुस्कुराना बन्द कर दिया – मैं समझ गया कि मज़ाक कब के ख़त्म हो गए हैं. पापा बड़ी देर तक ख़ामोश रहे, और हम सब भी ख़ामोश थे, फिर वे बोले, मगर न तो मुझसे न ही मम्मा से, बल्कि किसी ऐसे इन्सान से, जो उनका दोस्त हो:

 “नहीं, मैं शायद उस भयानक पतझड़ को कभी नहीं भूलूँग़ा,” पापा ने कहा, “कितना दुख, कितनी परेशानी थी तब मॉस्को में...युद्ध, फ़ासिस्ट शहर की ओर बढ़ चले आ रहे हैं. ठण्ड़, भूख, बड़े लोग भौंहे चढ़ाए घूम रहे हैं, हर घण्टे रेडिओ सुनते हैं...तो, सब साफ़ था, है ना? मैं तब ग्यारह-बारह साल का था, और, महत्वपूर्ण बात ये थी, कि मैं ख़ूब जल्दी-जल्दी बढ़ रहा था, ऊँचा-ऊँचा हो रहा था, और मुझे हर समय ख़ूब खाने का मन करता था. खाना मेरे लिए पर्याप्त ही नहीं होता था. मैं हमेशा मम्मी-पापा से ब्रेड मांगा करता, मगर उनके पास एक्स्ट्रा ब्रेड होती ही नहीं थी, वे अपनी ब्रेड भी मुझे दे देते, मगर मुझे ये भी बस नहीं लगती थी. मैं भूखा ही सो जाता, और सपने में भी ब्रेड ही देखा करता. क्या करता...सभी के साथ ऐसा ही था. ये इतिहास सबको मालूम है. इसके बारे में बार-बार लिखा गया है, बार बार पढ़ा गया है...

एक बार मैं एक छोटी सी गली में जा रहा था, जो हमारे घर के पास ही थी, और अचानक क्या देखता हूँ – एक बड़ा-भारी ट्रक खड़ा है, ऊपर तक तरबूज़ों से भरा हुआ. मुझे मालूम नहीं, कि वे मॉस्को तक पहुँचे कैसे. शायद तरबूज़ रास्ता भूल गए थे. शायद, उन्हें राशन-कार्ड पर बाँटने के लिए लाए थे. गाड़ी में ऊपर एक अंकल खड़ा था, ऐसा दुबला, दाढ़ी बढ़ी हुई, शायद बिना दाँतों वाला था, क्योंकि उसका मुँह अन्दर को खिंच रहा था. वो एक तरबूज़ उठाता और उसे अपने कॉम्रेड की ओर फेंकता, और वो – सफ़ॆद एप्रन वाली सेल्स-गर्ल को, और वो – किसी और चौथे को...उनकी जैसे चेन बन गई थी: तरबूज़ गाड़ी से दुकान तक जैसे किसी बेल्ट पर लुढ़कता चला जाता. और अगर किनारे से देखो, तो ऐसा लग रहा था कि लोग हरी धारियों वाली गेंदों से खेल रहे हैं, बड़ा दिलचस्प खेल था, मैं बड़ी देर तक खड़ा-खड़ा उन्हें देख रहा था, और दुबले अंकल भी मेरी ओर देखते हुए अपने पोपले मुँह से मुस्कुरा रहे थे, अच्छे इन्सान थे. मगर फिर मैं खड़े-खड़े थक गया और घर जाने ही वाला था, कि अचानक उस चेन में कोई गलती कर बैठा, शायद उसका ध्यान हट गया या फिर चूक गया, और फ़रमाईये – त्राख़!...एक भारी तरबूज़ अचानक फ़ुटपाथ पर गिर पड़ा. ठीक मेरी बगल में. वो कुछ आड़ा-टेढ़ा फूट गया था, और बर्फ की तरह सफ़ेद पतली परत दिखाई दे रही थी, उसके पीछे लाल-लाल गूदा, शक्कर जैसी नसें, और तिरछे-तिरछे बीज, जैसे तरबूज़ की शरारती आँख़ें भीतर से ही मुझे देखकर मुस्कुरा रही हैं. और, जब मैंने इस गूदे को और तरबूज़ के रस को उछलते हुए देखा और जब ये ख़ुशबू मुझ तक पहुँची, इतनी ताज़ा और इतनी तेज़, तभी मैं समझा कि मुझे कितनी भूख लगी है. मगर मैं मुड़ गया और घर की तरफ़ चल पड़ा. मैं वहाँ से हटा ही था कि अचानक मुझे सुनाई दिया – कोई मुझे बुला रहा है:

“बच्चे, बच्चे!”

मैंने चारों ओर देखा, मेरी तरफ़ वही बिना दांतों वाला मज़दूर भागा चला आ रहा है, और उसके हाथों में फ़ूटा हुआ तरबूज़ है. वह बोला:

 “प्यारे, तरबूज़ तो ले जा, घर में खाना!”

मैं उसकी तरफ़ ठीक से देख भी नहीं पाया था कि वो मुझे तरबूज़ थमाकर वापस अपनी जगह पे चला भी गया, बाकी के तरबूज़ों को उतारने के लिए. मैंने तरबूज़ को कस के दोनों हाथों में पकड़ लिया, और मुश्किल से घर तक पहुँचा, मैंने अपने दोस्त वाल्का को बुलाया, और हम दोनों ये बड़ा तरबूज़ खा गए. आह, कितना स्वादिष्ट था! बताना मुश्किल है! मैंने और वाल्का ने बड़े बड़े टुकड़े काटे, पूरी चौड़ाई में, जब हम उन्हें खाते तो तरबूज़ के टुकड़ों के किनारे हमारे कानों को दबाते, हमारे कान गीले हो गए और उनसे लाल-लाल तरबूज़ का रस टपक रहा था. हम दोनों के पेट फूल गए और वो भी तरबूज़ की तरह हो गए. अगर ऐसे पेट पर ऊँगली से टक-टक किया जाए तो पता है कैसी आवाज़ निकलती है! जैसे ड्रम बज रहा हो. हमें बस एक ही बात का अफ़सोस था, कि हमारे पास ब्रेड नहीं है, वर्ना हम और भी मज़े ले-लेकर खाते. हाँ...”

पापा मुड़े और खिड़की से बाहर देखने लगे.

 “और, इसके बाद पतझड़ का मौसम और भी बुरा रहा,” उन्होंने कहा, “ख़ूब ठण्ड पड़ी, आसमान से सर्दियों वाली, सूखी और भुरभुरी बर्फ गिरने लगी, और सूखी और तेज़ हवा उसे फ़ौरन उड़ा देती. खाना हमारे पास खूब कम हो गया, फ़ासिस्ट मॉस्को की ओर बढ़े चले आ रहे थे, मैं हर समय भूखा रहता. अब मुझे न सिर्फ ब्रेड के सपने आते, बल्कि तरबूज़ों के सपने भी आते. एक बार सुबह मैंने महसूस किया कि मेरा पेट तो है ही नहीं, वो जैसे रीढ़ की हड्डी से चिपक गया है, और मैं खाने के अलावा किसी और चीज़ के बारे में सोच भी नहीं सकता था. मैंने वाल्का को बुलाया और उससे कहा:

 “चल, वाल्का, उस तरबूज़ों वाली गली में जाएँगे, हो सकता कि वहाँ फिर से तरबूज़ उतारे जा रहे हों, और, हो सकता है, कि उनमें से एक गिर जाए, और वो लोग फिर से हमें वो तरबूज़ दे दें.”

हम दोनों ने कोई दादियों जैसे कपड़े पहने, क्योंकि ठण्ड भयानक थी, और चल पड़े तरबूज़ों वाली गली की ओर. सड़क पर मटमैला दिन था, लोग बेहद कम थे, और मॉस्को में ख़ामोशी थी, ऐसा नहीं, जैसा अब होता है. तरबूज़ों वाली गली में कोई भी नहीं था, और हम दुकान के दरवाज़ों के सामने खड़े होकर इंतज़ार करने लगे कि कब तरबूज़ों वाला ट्रक आता है. अंधेरा होने को आया मगर ट्रक आया ही नहीं. मैंने कहा:

“शायद, कल आयेगा...”

 “हाँ,” वाल्का ने कहा, “शायद, कल आए.”

हम घर चले गए. दूसरे दिन फिर से उस गली में गए, और ये जाना बेकार ही हुआ. हम हर रोज़ जाते और ट्रक का इंतज़ार करते, मगर ट्रक आया ही नहीं...

पापा ख़ामोश हो गए. वो खिड़की से बाहर देख रहे थे, और उनकी आँखें ऐसी हो रही थीं, जैसे वो कोई ऐसी चीज़ देख रहे हैं, जिसे न तो मैं, न ही मम्मा देख पा रहे थे. मम्मा उनके पास गई, मगर पापा फ़ौरन उठ गए और कमरे से बाहर चले गए. मम्मा उनके पीछे गईं. मैं अकेला रह गया. मैं भी बैठा था, और खिड़की से बाहर उसी तरफ़ देख रहा था, जिधर पापा देख रहे थे, और मुझे लगा कि मैं पापा को और उनके दोस्त को देख रहा हूँ, कि वो कैसे ठिठुर रहे हैं और इंतज़ार कर रहे हैं, इंतज़ार कर रहे हैं, इंतज़ार कर रहे हैं...ये सब मेरी बर्दाश्त से बाहर हो गया, और मैं अपनी प्लेट पर टूट पड़ा और चम्मच पे चम्मच खाकर पूरी नूडल्स खा गया, फिर उसे अपनी ओर झुकाकर, बचा-खुचा दूध पी गया, और ब्रेड से उसकी तली भी साफ़ कर दी, और चम्मच भी चाटकर साफ़ कर दिया।


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