शीर्षक - सबका दाता...... ईश्वर
शीर्षक - सबका दाता...... ईश्वर
शीर्षक - सबका दाता.... ईश्वर
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आज हर दिन की तरह सवेरे ७ बजे मैं अपने शहर से दूसरे शहर नौकरी पर जाने के लिए निकला था।मैं बस स्टेशन पहुचा और देरी से पहुचने कारण मेरी पहली बस निकल चुकी थी,और दूसरी बस में समय था। इसी बस का सहयोग करना था। अब कुछ लेट हो जाऊंगा। ऐसा मन में सोच ही रहा था कि..
😋
मैंने सोचा अब कही कुछ नाश्ता ही कर लिया जाए और कुछ भूख भी लगी थी मैं पास ही नाश्ता करने के लिए जा रहा था। एका एक...
मेरी नजर फुटपाथ पर बैठे दो बच्चों देखा चेहरा मासूम लगभग ७-८ वर्ष के लग रहे बच्चों की शायद भूख से हालत बहुत खराब लगी, और भूखे भी लग रहे थे। छोटे बच्चे बड़े को खाने के लिए कुछ कह रहा था। शायद पैसे न थे। और बड़ा चुप होने को कह रहा था। परन्तु भूख से उसकी कोशिश बेकार हो रही थी। मेरा मन भाव ने कहा कि उनको कुछ सहयोग करूं।
और बच्चों को देख मेरा मन भी भर आया l......... ईश्वर
मैंने सोचा इन्हें कुछ पैसे देकर आगे चलूं, और मैंने उन्हें 10 रु देकर आगे बढ़ा परंतु मेरे मन में एक विचार आया कि मैं कितना खुदगर्ज हूं कि मैंने 10 रु दिए उनको क्या मिलेगा शायद चाय भी ढंग से न मिल पाएं । और बस स्वयं पर शर्म के साथ सोच आयी फिर मैं वापस लौटकर उन दोनों बच्चों से कहा आओ कुछ खाते हैं। बच्चे एक-दूसरे को आंखों में बात कर बड़े ने सहमति दी दोनों बच्चे थोड़े असमंजस में पड़े फिर मैंने कहा बच्चों मैं भी नाश्ता करने ही जा रहा हुं आओ तुम भी कर लो। और वे दोनों भूख के कारण जल्दी ही मान गए। और उनके कपड़े गंदे होने से दुकानदार ने डाट दिया और अंदर आने से मना करने लगा । मैंने कहा भाई साहब मेरे साथ है और उन्हें जो खाना है वो उन्हें दे दो आपको पैसे मैं दूंगा।
दुकानदार भी आश्चर्य से मेरी ओर देखने लगा। सच भी यही कौन किसे सोचता है..
संकोच और शर्माते हुए बच्चों ने नाश्ते में परांठे मिठाई संग लस्सी भी इच्छा से पी ली। मैंने नाश्ता बच्चों को लाकर दिया और बच्चे जब खाने लगे तब उनके चेहरे की ख़ुशी कुछ अलग ही थी।सच पेट की भूख और हालात जीवन में सच बताते हैं।
अब मैंने बच्चों को कहा बच्चों अब तुम जाकर नहाने का साबुन लो और हैण्ड पम्प के पास नहा लेना। और रोज नहाना चाहिए। बच्चे भी सहमति से सिर हिला कर नहाने चले गए।और मैंने उन्हें फिर दोपहर शाम का खाना पास के मन्दिर में चलने वाले भन्डारे का बताया और मैं नाश्ते के पैसे दे कर फिर अपनी बसकी ओर बढ़ निकला और बस में बैठ सोचनें लगा क्या ईश्वर कुदरत की लीलाएं है।
बस वहा आसपास के यात्री मुझे बड़े सम्मान के साथ देख रहे थे और वो दुकानदार के शब्द बच्चों के लिए आदर मे बदल हो चुके थे।
और मैं बस स्टेशन की ओर निकला पड़ा था बस थोडा मन में नया और सोच अलग मन थोडा उन बच्चों के बारे में सोच कर व्याकुल सा रह रह कर हो रहा था। जबकि मेरा कोई रिश्ता न था फिर भी इंसानियत का सच मन में लगा। और रास्ते में मंदिर आया तब मैंने मंदिर की ओर देखा और कहा हे भगवान ! आप कहां हो ? ऐसे बच्चों की ये हालत ये भूख, आप देखो भगवान है। शायद यह मेरा वहम था।
हां दूसरे ही पल मेरे मन में ख्याल आया, तुम्हारे द्वारा जो अभी तक जो उन्हें नाश्ता दे रहा था वो कौन था। शायद मुझे ईश्वर ने ही कहा
हां क्या यही सच लगता है तुमने वह सब अपनी सोच से किया। मैं भी सोचने को मजबूर हो गया, मेरे मन की जिज्ञासाओं ने मौन धारण कर लिया। मुझे ऐसा लगा जैसे मैंने ईश्वर से बात की हो।
अब मुझे समझ आ चुका था हम तो केवल ईश्वर की राह मात्र है ईश्वर और कुदरत की राह ही हर एक को सहयोग कर रही हैं।हम सोचते हैं कि हमने किया है। परन्तु सब ईश्वर ही करते हैं।
हां बस यही प्रेरणा हम सभी को भगवान हमे किसी की मदद करने तब ही भेजता है हां जब वह हमे उस काम के लायक समझता है। और हम किसी की मदद को करना वैसा ही है जैसे भगवान के काम को करने की सोच रखते हैं। ***************** नीरज कुमार अग्रवाल चंदौसी उत्तर प्रदेश
