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Gita Parihar

Others


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सड़क हादसे

सड़क हादसे

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दोस्तों, साल में अकेले यमुना एक्सप्रेस वे ने 400 से अधिक जाने ले लीं हैं। आंकड़ों से सड़कों की सुरक्षा की भयावह तस्वीर नज़र आती है। हर साल अकेले यू पी में 20,000 लोग सड़क हादसों का शिकार होते हैं।

गाड़ी चालकों को त्रिस्तरीय जांच के बाद गाड़ी की कमान सौंपी जाती है। यह त्रिस्तरीय जांच है - पहली डिपो स्तर पर, दूसरी क्षेत्रीय स्तर पर और तीसरी कानपुर स्तिथ ड्राइविंग ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट के विशेषज्ञों द्वारा ।बावजूद इसके सड़क हादसों पर नियंत्रण क्यों नहीं हो पा रहा है ?

अनेक कारणों में से एक है ,वे संविदा चालक जो जुगाड़ के बूते ड्यूटी लगवा लेते हैं। यूं नियम के मुताबिक परिवहन निगम की बसें प्रतिदिन 300 किलो मीटर चलनी चाहिए, लेकिन रुपए कमाने के फेर में कुछ संविदा ड्राइवर खूब ड्यूटी लगवा लेते हैं।


दूसरा कारण है ट्रांसपोर्ट मानकों का उल्लघंन। मानक के अनुसार करीब 1100 किलो मीटर चलने वाली बसों में डबल ड्राइवर की व्यवस्था है। उससे कम दूरी पर यह व्यवस्था लागू नहीं होती। लखनऊ से दिल्ली की दूरी 1040 कि. मी.है,लिहाजा एक चालक होगा।अब सोच का विषय है कि मात्र 60 कि. मी. का मानक पूरा नहीं हो रहा है तो एक चालक इतनी लंबी दूरी की यात्रा करता है, तो उसमें कितने प्रतिशत खतरे को आंका जाएगा ?

मोटर ट्रांसपोर्ट एक्ट के मुताबिक साढ़े सात घंटे का संचालन दो फेज में होना चाहिए, यानी करीब साढ़े तीन घंटे बाद चालक को कुछ देर का ब्रेक मिलना चाहिए। मगर ऐसा होता नहीं है।

अमूमन तो सैंकड़ों किलो मीटर की दूरी तय करने वाले चालकों के विश्राम के लिए कोई व्यवस्था नहीं बनाई गई है। जहां बनाई गई है ,वहां के हालात विश्राम देने के नाम पर मज़क हैं।

 

जो मॉडल बस स्टेशनों और कुछ स्थानों पर रेस्ट रूम बनाए गए हैं, वहां चालक ₹35 देकर विश्राम कर सकते हैं। जरा सोचिए ,बाहर जाने वाले जिस चालक को श्रेणी वार 73 और 68 रुपए भत्ते के रूप में मिलता है ,उसमें से उसे विश्राम के लिए ₹35 खर्च करना पड़े ,तो वह 4 घंटे आराम के ₹35 , देगा कि धन उगाही से बचने के लिए नींद में कटौती करेगा ? इसी आधी अधूरी नींद का नतीज़ा सड़क दुर्घटना में तब्दील होता है।

 रेस्ट हाउस बदहाल हैं । वहां टूटे हुए तख्त , इधर-उधर झूलते तार और आवाज़ ज़्यादा और हवा कम देने वाले पंखे देखने को मिलते हैं।

अन्य कारणों में से एक कारण बस में क्षमता से अधिक यात्रियों को भरना भी है, विशेष रूप से अभी जो पहाड़ी क्षेत्र में हादसा हुआ उसके पीछे यही कारण था।


बस की तेज़ रफ़्तार और लापरवाही भी दुर्घटना का प्रमुख कारण है। सालाना 1,50,000 मौतें इन्हीं कारणों से होती हैं।

तेज़ गति पर नियंत्रण के लिए 80 -100 की गति सीमा निर्धारित होनी चाहिए।लेकिन चालक निर्धारित सीमा से ऊपर ही चलते हैं।इन पर दंड का प्राविधान होना चाहिए।

गाड़ियों के टायर में अनिवार्य रूप से सिलिकॉन लगाने और सामान्य हवा की जगह नाइट्रोजन का उपयोग किया जाना चाहिए।

 सिलिकॉन ,टायर को ठंडा रखने में मदद करता है।जबकि मौजूदा टायर सीमेंट और कंक्रीट की सड़क पर , तेज़ रफ़्तार गाड़ी होने से गर्म होकर फट जाते हैं।


आधुनिक सड़कें तो बन गईं,वाहन भी तेज़ रफ़्तार आ गए लेकिन यदि चालक आधुनिक तकनीक के वाजिब इस्तेमाल से अनभिज्ञ रहे तो सड़क दुर्घटनाएं होती रहेंगी ,निर्दोष जाने जाती रहेंगी।



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