परियों की कहानी
परियों की कहानी
परियों की कहानियों में एक अद्भुत आकर्षण होता है जिसे पढ़कर मन आह्लादित होता है । और परम आनंद की अनुभूति होती है । ऐसा लगता है कि मैं बन जाऊं वैसी ही ग़रीब दुखियारी और अनाथ फिर मिल जाए कोई सोनपरी और घुमाकर जादू की छड़ी पल भर में कर दें सब कुछ सुव्यवस्थित ।
बचपन में मां ने सुनाई थी एक सिंड्रेला की कहानी और ऐसी ही एक और बच्ची की कहानी जिसका नाम था लक्ष्मी उसके माता पिता का देहांत हो गया था इसलिए चाचा चाची के घर पर रहती थी । वहां उसे बहुत दुःख और तकलीफ़ उठानी पड़ती थी । घर के सारे काम निपटा कर जब सोने के लिए बेड पर जाती तब उसके चचेरे भाई बहन अपना अपना होमवर्क करने को कहते कभी कभी तो कर देती मगर जब कभी ज्यादा थकी होती तो सो जाती । उसके चचेरे भाई बहन उसके बेड पर पानी डाल देते फिर सर्दी के रात में ठिठुरते हुए बैठकर रात गुजारती । दूसरे दिन फिर घर का सभी काम निपटा कर स्कूल गई । उस दिन हिन्दी के कक्षा में उसकी टीचर ने बौना मोची की कहानी पढ़ने को कहा । बेमन से खड़ी हुई और कहानी पढ़ने लगी । कहानी पढ़ते पढ़ते उसके चेहरे पर मुस्कान खिल गई शायद कोई उम्मीद की किरण दिखाई पड़ने लगी । उस दिन बड़ी खुशी खुशी वो घर आई । आते ही अपने हिस्से का काम निपटाया और किताब खोलकर पढ़ने बैठ गई । उसे पढ़ने में मन लगने लगा । उसने दूसरी कहानी भी पढ़ी "सोनपरी" की । न जाने क्यों अब उसका मन प्रसन्न रहने लगा ।
उसके जीवन में बहुत तेज़ी से और सुखद परिवर्तन होने लगा । घर के काम भी कम समय में और बेहतर करने लगी । उसके चाचा और चाची भी उसकी प्रशंसा करने लगें । भाई बहनों के होमवर्क के कॉपी में भी "एक्सिलेंट" का रिमार्क मिलने लगेगा जिसकी वजह से उन दोनों का व्यवहार लक्ष्मी के प्रति कृतज्ञता पूर्ण होने लगा ।
लक्ष्मी हिंदी के बाद गणित और अंग्रेजी में भी रूचि दिखाने लगी फिर उसने पढ़ी "सिंड्रेला" की कहानी । उसके मन में हलचल हुई और आंखों में चमक आ गई । मानो वो स्वयं सिंड्रेला हो और उसे चुन लिया है वो राजकुमार जिसके साथ वो नृत्य कर रही है ....... सपनों की ऊंची उड़ान भरने के बाद धीरे धीरे जब उतरती है यथार्थ के कठोर धरातल पर तब भी मायूस नहीं हुई । उसे यकीन हो गया है कि एक न एक दिन उसे मिलेगा कोई राजकुमार और अपने घोड़े पर बिठाकर ले जाएगा सात समंदर पार .........।
