फोटो फ्रेम के पीछे वाली कील
फोटो फ्रेम के पीछे वाली कील
मेरी खास सहेली की शादी थी। शादी की गहमागहमी में मैं कभी इधर तो कभी उधर जा रही थी। शादी के उन सारे फंक्शन में एक लड़का बार बार कही न कही मुझसे टकरा रहा था।
कुछ दिनों के बाद उसी लड़के का मेरे लिए रिश्ता आया। घरवालों को रिश्ता पसंद भी आ गया था..
लड़का बिज़नेस मैन का बेटा था। घर परिवार अच्छा था। दोनो परिवारों की रजामंदी से शादी हो गयी। नयी नयी शादी में दिन कैसे निकल गये पता ही नहीं चला।
शादी की छुट्टियों के बाद मेरा ऑफिस जाना स्टार्ट हुआ। इसी दरमियान हमारी बेटी हुयी और मेरा घर-ऑफिस चलता रहा।
धीरे धीरे पापा के बिज़नेस मे पति की हैसियत का मुझे अंदाजा हो गया। दिनों दिन पति महोदय का घर से बाहर रहना बढ़ने लगा।
लेकिन मेरे जैसे एक सरकारी अफ़सर से उसकी पटरी कैसे बैठती जिसका कुछ खास बिज़नेस न हो...फिर भी अपनी गृहस्थी को मैं जब तब बाँधने का प्रयास करती रही। लेकिन पति महोदय धीरे धीरे फ्रस्टेट होकर शराब में डूबने लगे... और मैं अपने ऑफिस के कामों के साथ साथ सोशल सर्कल में...
जिंदगी इसी रौ में चलती रही...
कुछ दिनों से ऑफिस के एक महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट पर काम करते हुए एक कलीग से मेरी नज़दीकियाँ बढ़ने लगी। मुझे उनका साथ भाने लगा।
यह सब सही नहीं था लेकिन मुझे वह सब सही लग रहा था...मैं अपने तरीके से जिंदगी जीना चाहती थी...
और प्यार करना कोई गुनाह थोड़े न है, नहीं?
आज प्याज़ काटते वक़्त ना तो आँखों से पानी बहना कम हो रहा था और ना ही परत दर परत छिलके भी उतरने का नाम ले रहे थे......
