नई पहल
नई पहल
हर साल की तरह इस साल भी विद्यालय में बुजुर्ग दिवस पर वृद्धाश्रम से सभी बुजुर्गों को ससम्मान बुलाया गया। बच्चों में उत्साह देखते ही बनता था। क्योंकि पेट पूजा के साथ-साथ आज मस्तिष्क का भी अच्छे-अच्छे विचारों, कहानियों व अनुभवों से पोषण होना था। निर्धारित समय पर गाड़ी जैसे ही विद्यालय के गेट पर पहुँची, सभी बच्चे गेट की ओर दौड़े और लगे अपने-अपने मित्र बनाने, लेकिन सूरज गेट के पास दूर ही खड़ा रहा। उसने किसी भी बुजुर्ग को अपना मित्र नहीं बनाया। एक बुजुर्ग महोदय बार-बार सूरज के पास जाने का प्रयास करते रहे, पर सारे प्रयास विफल रहे। शाम तक सभी ने आपस में बहुत सारी खुशियाँ बाँटी, लेकिन अब विदाई का समय आ चुका था। सभी बुजुर्गों ने पुनः जल्दी मिलने का वादा किया और वृद्धाश्रम की ओर उनकी गाड़ी चल पड़ी। लेकिन अभी-भी सूरज आँखों में आँसू लिए खड़ा रहा। घर पहुँचकर अपने दादाजी की तस्वीर को चूमकर प्रणाम किया और तस्वीर पर टँगी माला को बदलकर तस्वीर के पास ही बैठ गया। तभी कीचन से माँ की आवाज आई, "खाना तैयार है सूरज।"
सूरज खाना खाने चला तो गया, लेकिन खा नहीं पाया। यह सब देख रश्मि ने सूरज की परेशानी जाननी चाही। तब सूरज ने पूछा "माँ क्या हम वृद्धाश्रम से नए दादाजी नहीं ला सकते। मेरे साथ खेलने वाला भी कोई नहीं है। ना ही मुझे कोई अच्छी-अच्छी कहानियाँ ही सुनाता है। फिर आप और पापा भी देर रात ऑफिस से आते हैं। तब तक मैं तो अकेला ही होता हूँ न!" रश्मि को सूरज का दर्द समझते देर न लगी।
अतः अगले ही दिन सूरज के मनपसंद दादाजी को घर लाने की ज़ोर-शोर से योजना बनाई जाने लगी।
