मुस्कानका संदेश
मुस्कानका संदेश
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शामके समय पल्लवी घर जानेके लिये बस स्टॉप आकर बसका इंतजार कर रही थी । पर बस थी कि आने का नाम ही नहीं ले रही थी । अगर आ भी जाती तो भी डसे खचाखच भरी होती या स्टॉप पर बिना रुके ही चली जाती । अगर रुक भी जाती स्टॉप से इतनी दूर खडी होती भागकर जाने से पहले ही बस निकल पडती ।
दो घंटेसे बस यही हो रहा था । अंधेरा भी घना होने लगा । वो सोच में पड गई कि घर कैसे पहुचेगी ? बडी मुश्किल से एक बस दूरसे आती हुई नजर आई उसने सोचा अगर ये रुकी तो किसी भी तरह इसमें चढ जाना ही होगा वरना डबल डाँट खानी पडेगी । सास तो वैसे भी बोलती ही रहती है पतिको भी बोलनेका मौका मिल ही जायेगा । पर ये दोनों में से कोई नहीं समझता कि बस मेरे मायकेसे नहीं आती ।
जैसे ही,बस रुकी तो वो किसीभी तरह धक्के खाकर बसमें चढ गई । टिकट लेकर लेडिज सीटकी तरफ किसी तरह लडखडाती पहुँचकर सीट पे लगा हैंडल लपककर पकड लिया । बसमें इतनी भीड थी कि पूछो मत । उपरसे लेडिज के यहाँ जरा सा धक्का लगनेपर तु-तु .मैं मैं हो रही थी .और पुरुषोंकी तरफ हातापाई । किस-किस को कंडक्टर संभआले अपना काम करें या भीडमें समझौता करता फिरे । इतना शोर गुल हो रहा था कि कुछ सुनाई भी नही दे रहा था। ड्राईवर अपना काम कर रहा था । पल्लवी की नजर पास ही में बैठी एक महिला की गोद में बैठी हुई एक चार सालकी छोटी सी बच्ची पर पडी । वो बच्ची बेफिकर, अपनीही धुन में मस्त होकर आँखमिचौली खेल रही थी कभी आँखें बंद कर रही थी तो कभी आँखें खोलकर देख रही थी। पर उसका ध्यान इस तरफ था ही नहीं बसमें क्या हो रहा है ?उसके चेहरेपे एक मासुम मुस्कान थी । जो बरबस पल्लवी को खींचे जा रही थी । उसने उस बच्चीके गालोंको प्यार छुआ। वो बच्ची उसे देखकर मुसकाई ।उस बच्ची की बाल लीला देखकर कुछ समय बीता । अगले स्टॉप पर उतरने के लिए उस बच्ची माँ उसे गोद में उठकर खडी हो गई । वो जगह खाली होनेपर वो वहाँ बैठ गई। बसके रुकने पर वो दोनों चले गये । पल्लवी सोचती रह गई कि ,ये बच्चे कितने मासुम होते हैं । काश ! बडे भी ऐसे ही होते तो न ये तु-तु मै-मैं होती न झगडे होते होते । दुनिया में कितनी शांति होती । उसे ऐसा लग रहा था कि उस बच्ची की मुस्कान हर हालतमें मुस्कुराते रहने का संदेश दे रही थी ।
