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Bhawna Kukreti

Children Stories Drama


4.8  

Bhawna Kukreti

Children Stories Drama


लॉक डाउन-11(आपबीती)

लॉक डाउन-11(आपबीती)

6 mins 141 6 mins 141

आज ये "सुबह" बहुत आलस में है। कल रात डेढ़ बजे के लगभग हम लोग सोये। इस वक्त सब आराम से चल रहा है, सुबह के 10 बज गए हैं। आज पापा का फोन आया है।"ससुराल में इतना डूब गई कि अपना हाल बताना भूल गयी"। हाँ जी सॉरी,अक्सर मायके से ही सबके फोन आते हैं। मैं फिर सफाई देती हूँ की फलां वजह से ध्यान नहीं रहा।कभी नहीं भी देती हूँ।बड़ी हूँ मगर "छोटे की तरह "ट्रीट की जाती हूँ, मतलब की सब नखरे उठाते है, इसके पीछे वजह पता नहीं।पर सब बहुत प्यार देते हैं। पापा ने डिटेल में इनसे मेरी रिपोर्ट ली,छोटे भाई और बहू ने भी बात की।एक चिंता की बात भी है।वो जहां रहते हैं उनके फ्लैट से 50 मीटर दूर एक कोरोना पेशंट को क़ुरएन्टीन किया गया है। पूरी सोसाइटी सील है।बहू पर दो दो छोटे बच्चों के साथ साथ पूरे घर का काम भी पड़ गया है।अभी सिजेरियन हुआ था।भाई जितना होता है करता है।पर फिर भी काम होता ही है।फिर भाई और पापा जी का रूटीन भी है, उन्होंने काफी चेंज किया है फिर भी ताल मेल मिलाना। सच औरतें बूढ़ी हों या युवा ,जो संबल घर को वो दे पाती हैं वो कोई नही दे सकता।


इनका फोन फिर घनघना रहा है, सहारनपुर से फिर इनपुट मिल रहे हैं। मुझे लगता है ,डेस्क ने शायद खबर में कुछ कलाकारी दिखा दी है। रिपोर्टर परेशान हैं और प्रशासन से लगातार फोन आ रहे है।ये पता नही कैसे ,ऐसे में शांत रह लेते हैं? इनका धीरज इतना अथाह है कि मैं हमेशा अचंभित ही जाती हूँ।और कभी मामूली सी बात पर नाराज भी हो जाते है पर वो कभी कभार ही होता है ।पर अभी तो भोले नाथ की तरह आंख बंद कर सुन रहे हैं सबकी। मैने एक बार दैनिक हिंदुस्तान के लिए एक आर्टिकल लिखा था, साइन्स जर्नल और सी बी आर आई के एक रिसर्चर से बात करके। न्यू जेनेरेशन की सस्ती ड्रग्स पर।बड़ी मेहनत की थी पर उस पर, सब एडिटर ने ही तमाम बेफिजूल सवाल उठा दिए थे कि... क्या बताऊँ कैसा लगा।फिर वो प्रोफेशन ही छोड़ दिया।असल मे सरकार की योजना के खिलाफ ही जा रहा था लेख। और आज सब जानते हुए भी में अपनी हालत के लिए प्रीगैबलिन पर निर्भर हूँ जो शायद दर्द के अहसास को महसूस नही होने दे रहा। जितना तब जानकारी जुटाई थी उसके अकॉर्डिंग तो बुढ़ापे में दिखाये गई ये दवा असली असर शायद..अभी तो राहत के साथ थोड़ा डिजिनेस बनी रहती है।टेढ़े तिरछे कदम पड़ रहे ।


अभी बेटा, दादी जी के साथ कैरम खेल रहा है।दादी जी छेड़ रहीं है "हारेगा-हारेगा" और वो चिढ़ रहा है "दादी डीमोटिवेट मत करिए" ।मम्मी जी हंस रहीं है कह रहीं हैं "किसी के कहने से कुछ थोड़े न होता है,तुम अपने निशाने पर ध्यान दो, हमारी बात पर कान न धरो,हम तो तुम्हारे कम्पटीटर है"।


सोच रही हूँ,सच मे किसी की बात पर ध्यान नही देना चाहिए।कुछ लोगों की आदत ही होती है डेमोरलाइसड करने की।आज मोदी जी ने दिया जलाने का आह्वाहन किया है मगर सोशल मीडिया पर कुछ बुद्धिजीवी लोग लगे पड़े हैं उनका मजाक उड़ाने। डूबते को तिनका दिखता है तो वो तिनका पकड़ता है,प्रयास करता है। सो प्रत्यक्ष में वो किया जा रहा है ,अप्रत्यक्ष रूप से युद्ध स्तर पर सरकारी अमला भिड़ा पड़ा है कोरोना से जीतने के लिए।पर मोदी जी ने मानस को मोटिवेट रखने के लिए कुछ करने को कहा है तो ये 2-3 ℅ "ए सी " में बैठने वाले बुद्धिजीवी ज्ञान दे रहे।आम भारतीय जनमानस की मनः स्तिथि और विचार धारा, दृष्टिकोण और परिस्थिति का ज्ञान नही और चल दिये विरोध करने।

मोबाइल पर लिखते लिखते मेल पॉप अप हुई थी ।स्टोरी मिरर से सृष्टि जी की, लिंक भेजा है, 4 बजे कविता पाठ के लिए।चलो देखूँ की कौन सी आज प्रस्तुत करूँगी।एक अच्छी बात ये लगी कि वहां सब उत्साहित करते हैं आपस मे, पर सच लिखूँ मुझे सबके बीच अपनी कविता...पता नही किस स्तर की होती हैं मेरी कविताएं ?!


हो गया, आज आशा जी ने स्टोरी मिर्रर की ओपन माइम पोएट्री का संचालन किया था ,बहुत साधा हुआ और परफेक्ट लगा।बिना किसी को मना किये बहुत शालीनता से उन्होने सबको सुना और सुन ने सुनाने को प्रेरित किया।नन्हे बच्चे भी इतने अच्छे से कविता कह रहे थे कि आश्चर्य हुआ।मैने भी एक कवि की कविता कहने की तर्ज से इंस्पायर हो कर कविता के साथ एक ग़ज़ल जैसा कुछ पढ़ा।चैट बॉक्स में अच्छी सराहना मिली।अच्छा लगा।


यार ,आज कल लेटे लेटे खाना भी नहीं पचता।सामने दो से ज्यादा आइटम होते है तो मन हट जाता है।मम्मी जी समझ गयीं हैं, जब थाली में रखी चीज कम होने लगती है तो आकर दूसरी चीज रख देती हैं ,"तुमको ये देना भूल गए, ये ताकत देता है" ,किसी तरह वो खत्म होती है तो " इसे खाने से हर्ज नही करेगा ,खा लो", फिर कुछ देर में "तुम्हारे लिए दही रखे थे।" ना कर दो तो... "दही पेट के लिए अच्छा होता है, चुपचाप खाओ"। अब मुझे एक रास्ता सूझा है, अबकी कहूंगी "में रात में खा लूंगी"।


बेटा बता रहा है, अभी फिर सैनीटाइज़ करने वाले आये है ।इस बार पूरी सड़क पर अच्छे से छिड़काव हो रहा है।


9 बजने वाले हैं,घर मे इनको छोड़ सब सुपर एक्ससाईटेड हैं।ये काम पर लगे हुए हैं, इस इवेंट की कवरेज भी बम्पर करानी है।तो कंप्यूटर और फोन पर लगातार बने हुए है। नाम की छुट्टी होती है इस अखबार की दुनिया मे।खैर मम्मी जी ने दिए तैयार कर लिए हैं। बेटा मोमबत्ती जला कर रेडी है। समय देखा जा रहा है , 9 बजने में अभी 3 मिनट हैं...अभी 2 मिनट हैं. अब एक मिनट है.. अब जलाओsssss ...बेटे का उत्साह टॉप पर है।मम्मी जी ने सारी ट्यूब लाइट बंद कर दी

हैं। मेरे कमरे में घुप्प अंधेरा हो जाता अगर मैं मोबाइल पर ये सब लिख न रही होती।


पूरी कॉलोनी या तो देशभक्त है या मोदी भक्त है या डूबते को तिनके का सहारा जैसी आस में है। बेटा बालकनी से ऊंचे स्वर में कमेंट्री कर रहा है मेरे लिए।"सब तरफ दिए जल रहे हैं।पीछे की गली में लोग देशभक्ति के गाने भी बजा रहे है।पटाखे भी छूट रहे हैं और ये देखिए कोरोना को भूल ,महाssssन लोग आपस मे मिल भी रहे हैं..तालियाँ" मम्मी जी ने उसे टोक दिया है कि ऐसे क्यों कह रहा है, ऐसे नहीं कहा जाता।" बोल रहा है ,माँ हम सब छत पर जा रहे वीडिओ बनाएंगे ,तब देखना आप।


रात गहरी हो गयी है आज भी इनकी एडिटर, रिपोर्टर्स से लंबी-लंबी बात हो रही है, मम्मी जी बड़बड़ा रही हैं, एक मिनट भी फोन बंद नही होता, कहाँ छुट्टी पर है,?! नाश हो इस कोरोना का।

सच आज दिए जलाते हुए हर घर कोस रहा होगा इस कोरोना को। ये अब खत्म ही हो जाएगी।



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