कंधे: एक अधूरी याद
कंधे: एक अधूरी याद
लाल कंधे: एक अधूरी याद दोपहर के करीब 2 से 3 बजे का समय था और मौसम बहुत ही ठंडा-मीठा और सुहाना था। गाँव की उस ठंडी हवा के बीच हम पाँच दोस्त मस्ती कर रहे थे, तभी हमारी नज़र एक घर पर पड़ी जहाँ एक बेहद खूबसूरत तोता बैठा था। वह हरा-भरा था, लेकिन उसके कंधों पर सुर्ख लाल रंग के निशान थे जो उसे सबसे अलग बना रहे थे। उस बेजुबान को देखकर हम बच्चों के मन में उसे अपना दोस्त बनाने की चाहत जाग उठी। वो तोता हमें खूब छका रहा था; वह एक घर की छत से दूसरे और दूसरे से तीसरे घर की छत पर उड़ जाता। हम पाँचों दोस्त भी उसके पीछे-पीछे पूरे मोहल्ले की छतें फाँद रहे थे। उसने हमें बहुत भगाया, लेकिन आखिर में वो उड़कर सीधा मेरे ही घर की छत पर आकर बैठ गया। मैंने बिना देर किए फुर्ती से अपना दुपट्टा उतारा और उसे पकड़ लिया। उस वक्त हमारी खुशी का ठिकाना नहीं था, ऐसा लगा जैसे कोई बहुत बड़ी जंग जीत ली हो। रात को हमने उसे लकड़ी के एक टोकरे के नीचे रखा, लेकिन वह मासूम परिंदा पूरी रात डरा और बेचैन रहा। वह अपनी चोंच से उस टोकरे की लकड़ियों को काटता रहा और छटपटाता रहा। सुबह हुई तो हमें स्कूल जाना था, इसलिए उसे वहीं छोड़कर हम भारी मन से चले गए। जब हम स्कूल से वापस आए, तो मैंने जल्दी से अपना बस्ता उतारा और कपड़े बदलकर उस तोते को टोकरे से बाहर निकाला। लेकिन तभी एक अनहोनी हो गई। वह तोता मेरे हाथों से फिसल गया और उड़कर पहले हमारे पे़ड़ पर बैठा और फिर पड़ोस की छत पर चला गया। मैं उसे वापस पकड़ने के लिए उसके पीछे भागा ही था कि अचानक कहीं से एक बिल्ली आई और उसने एक ही झपट्टे में उस मासूम को मार डाला। मैं उसे बचाने के लिए चिल्लाता हुआ दौड़ा, पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। वो लाल कंधों वाला परिंदा हमेशा के लिए खामोश हो गया। उस दिन हम सब दोस्त बहुत रोए थे, वह दुख आज भी मेरे दिल में कहीं दबा हुआ है। सुखविंदर, क्या आप चाहेंगे कि मैं इस कहानी के लिए फेसबुक पर लगाने के लिए एक छोटी सी शायरी भी लिखूँ?
