जन्म दिन
जन्म दिन
चर्चगेट स्टेशन के सामने वाला वह इलाका , सत्कार रेस्टोरेंट के बाहर पवन खडा़ अपने दोस्त पुष्पक का इंतजार क रहा था । उसने वादा किया था वह जरुर यहीं मिलेगा । पर जाने क्या बात हुई ? पवन से इंतजार के पल काटे नहीं कट रहे थे । उसने पास के न्यूज पेपर स्टाल से एक दोपहर का अखबार खरीदा। उसने कुछ ही देर में सारा अखबार पढ़ डाला पर अभी तक पुष्पक का पता नहीं था । पवन की नजरें उसी को ढ़ूंढ़ रही थीं और वह है कि नजर ही नहीं आ रहा था । उसने फिर एक बार अखबार में नजर गडा़ ली ।तब किसी ने उसका कंधा थपथपाया । अखबार हटाकर देखा तो सामने पुष्पक खड़ा था । "अरे, क्या बात है यार, मुझे तुम कहां गायब हो गये ? पवनने पूछा ।
" वो बात ऐसी थी कि आज मेरा जनमदिन है । घर वाले बहुत सारी औपचारिकाताएँ कर रहे थे इसलिए देर हो गई ,सॉरी यार,बहुत देर तक इंतजार करना पड़ा न तुझे ?"पुष्पक ने पूछा ।
"तुम्हारा जन्म दिन है ,और हम इतनी देर इंतजार में खड़े हैं । हमें पता तक नहीं ,वाव ! मेनी हैपी रिटर्नस ऑफ द डे डियर पुष्पक " पवन ने जनमदिन की बधाई दी ।
"थँक्यु यार, चल रेस्टोरेंट में चलकर पार्टी करते हैं मैं तुझे सप्राईज देना चाहता था इसलिए मैंने तुझे बुलाया था पर देर हो गई । चल अंदर चलते हैं ।"कहकर पुष्पक पवन को रेस्टोरेंट में ले गया । यहां भी काफी भीड थी । कोई भी मेज खाली नहीं थी । थोडी देर इंतजारके बाद एक मेज खाली हुई , दोनों वहाँ जाकर बैठ गए । उन्हें देखकर बैरा आया । पुष्पक ने खाने पीने की चीजों का ऑडर दिया।दोनों में खूब गपशप हुई । इस बीच उनका ऑडर भी आ गया । दोनों खा-पी रहे थे । बातों ही बातो में पुष्पक ने पवन से पूछा " यार तुम्हारा जनमदिन कब है ?" " मेरा ?" पवनने मुस्कुराकर पूछा ।
"हां, तुम्हारा " पुष्पक ने दोहराया
"यार मेरा तो हर नया दिन जन्मदिन ही तो है ।"पवन ने मुस्कुराकर कहा ।
"वह कैसे ?"पुष्पकने पूछा ।
" शहर की जिंदगी का पिछला दिन जाने कितनी मुश्किलों और तनावों से गुजरता है । इससे उबरकर हम जब दूसरे दिन बिस्तर से उठते हैं तो क्यों न खुशी से मनाया जाय । खुशी मनाने के लिये सारा साल जन्मदिन का ही इंतजार क्यों करें ? वैसे शहर की जिंदगी का कोई भरोसा तो है नहीं । कौन सा हादसा कब हो जाये कुछ कहा नहीं जा सकता है । अगले पल का भी भरोसा नहीं कर सकते । और बंबई शहर तो हादसों के शहर के नाम से वैसै भी मशहूर है । कब क्या हो कुछ कहा नहीं जा सकता । तो सारी खुशियाँ एक दिन के लिए ही क्यों रखी जाय? हर दिन क्यों न थोड़ी खुशियाँ मनाई जाये । पवन ने कहा ।
"वाव! तुम्हारी खुशियों को मनाने का फलसफा बहुत बढ़िया है यार ! मान गये उस्ताद । " चलो अब फिल्म देखने चलते हैं ।" पुष्पक ने कहा ।
"हां पर फिल्म मैं दिखाऊंगा।" पवन ने कहा। "ओके जैसे तुम्हारी मर्जी " पुष्पक मान गया और दोनों फिल्म देखने चले जाते हैं ।
