होली तो होली
होली तो होली
हाँ वह अच्छी लड़की थी,,जब भी आमना सामना होता ,,कहती,"कैसी हो आंटी?'
मैं भी हंस कर कह देती ,' सब ठीक है। अपनी बताओ कैसा चल रहा है?'
अभी होली के आठ दिन बाद दीना चाची मिलने चली आयीं। मैंने भी पूछ लिया। 'क्या समाचार हैं तुम्हारे मुहल्ले के?'
'कछु मत पूछो,हाल बहुत खराब हैं 'दीना चाची ने आवाज धीमी करते हुए कहा।
'क्या हुआ?'
'छमिया की छोरी और सहेली होली के दिन से गायब हैं। सबेरे रंग लेके घर से बाहर गयी हतीं।घर लौट के नाय आयीं।'
'रिपोर्ट लिखाई कि नहीं ?' मैंने घबरा कर पूछा।
'लिखाई है,पर कोई पतो नाय चल रह्यो।'
' हे भगवान!' इतनी खूबसूरत लड़की ! रंग दूध सा कि धूप में भी मैला न हो। नैन -नक्श और मुस्कराहट इतनी अच्छी की दीनता का नामोनिशान भी न दिखाई दे। बचपन से उसे अपनी माँ के साथ काम करने आते-जाते देख रही थी। अब अकेले भी जाने लगी थी। पाँच क्लास पढ़ कर ही पढ़ाई छोड़कर बर्तन, झाड़ू-पोछा में अपनी माँ का सहयोग करने लगी थी।
आज भी उसका कोई पता नहीं चला है,पता नहीं कौन ले गया,किस हाल में होगी,क्या हुआ होगा उसके साथ? ईश्वर उसकी सहायत करें। बहुत अच्छी लड़की थी। एक राजकुमारी सी भोली, न जाने किसकी हो ली।
