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Priyanka Gupta

Children Stories


4.5  

Priyanka Gupta

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एक नयी दुनिया

एक नयी दुनिया

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" मनहूस ,पता नहीं कहाँ जाकर मर गयी। पैदा होते ही अपनी माँ को खा गयी।वह बदनसीब तो चली गयी ,लेकिन इस मनहूस को छोड़ गयी ,मेरी छाती पर मूंग दलने के लिए। ",राधा की सौतेली माँ चिल्ला रही थी।


राधा, भूषण जी की पहली पत्नी माधवी से जन्मी बेटी थी। राधा को जन्म देते ही माधवी चल बसी थी। भूषणजी माधवी की मृत्यु से अत्यंत व्यथित थे और उन्हें अपनी व्यथा का एकमात्र कारण अपनी नवजात पुत्री राधा ही लगती थी। अतः राधा अपने जनम से लेकर आज तक अपने पिता की एक प्यार भरी नज़र भी नहीं पा सकी थी।


राधा की माँ माधवी की मृत्यु के बाद राधा के पिता भूषण ने मृदुला से दूसरा विवाह किया था। जिस बच्ची का जन्मदाता ही उससे नज़रें फेर लें तो ,सौतेली माँ से तो क्या उम्मीद की जा सकती है ? कुछ समय बाद राधा की सौतेली माँ मृदुला ने एक पुत्र को जनम दिया। गोल -मटोल अर्जुन सभी की आँखों का तारा था। घर में एक अर्जुन ही था ,जो राधा से स्नेह रखता था। राधा भी अर्जुन पर अपना सर्वस्व लुटाने के लिए तैयार रहती थी।


राधा सुबह -सुबह पूरे घर भर के लिए गांव के कुएं से पानी भर के लाती थी ,उसके बाद वह जंगल से लकड़ियां बीनकर लाती थी। सौतेली माँ उसके खाने के लिए रात की बची रोटियां नमक -मिर्च के साथ बाँध देती थी। घर में कभी कितने ही पकवान बने हों ,उसे हमेशा वही सूखी रोटी खाने को मिलती। कभी -कभी अर्जुन अपनी माँ से छुपाकर अपनी बहिन के लिए लड्डू ,बर्फी आदि लेकर आ जाता था।


अर्जुन कहता ," माँ बहुत बुरी है ,दीदी। आपको हमेशा ही सूखी रोटियां खाने को देती हैं। "


तब राधा कहती ,"नहीं ,राजा भैया ,माँ को पता है कि अर्जुन राधा को सब पकवान खिला देता है। अगर माँ मुझे पकवान दे देती तो ,मुझे अपने राजा भैया के हाथों से पकवान खाने को थोड़े न मिलते। ये सिर्फ पकवान नहीं है ,तेरा प्यार है। माँ बहुत अच्छी है। "


राधा अपनी उम्र से बहुत पहले ही बहुत समझदार हो गयी थी। जाने किस मिट्टी की बनी थी कि उसके मन में अपने पिताजी और सौतेली माँ के लिए कोई कड़वाहट नहीं थी। वह जिस हाल में थी ,उसे भगवान् की मर्ज़ी मानकर, उसी में खुश रहती थी।


ज़िन्दगी अपनी रफ़्तार से चली जा रही थी। प्रतिदिन की तरह राधा पानी भरने के बाद जंगल लकड़ियां लाने के लिए जाते हुए अपनी सौतेली माँ से बोली ,"माँ ,जंगल जा रही हूँ ,शाम तक लौट आऊँगी। "


"प्रतिदिन जंगल जाती है और मुँह उठाकर लौट भी आती है । कोई जंगली जानवर भी इसे खाता नहीं है । ", राधा की सौतेली माँ ने दुत्कारते हुए कहा ।


लेकिन राधा ने अपनी माँ की बात को सुना -अनसुना कर दिया । अपने भाई अर्जुन को लाड़-दुलार करके राधा जंगल की तरफ चली गयी थी ।


राधा जंगल में सूखी लकड़ियाँ बीनने लगी ,लकड़ियाँ बीनते -बीनते राधा जंगल के अंदर जाते जा रही थी । राधा घने जंगल में पहुँच गयी थी । जब राधा ने पर्याप्त लकड़ियाँ एकत्रित कर ली तो ,उसने इधर -उधर देखा । अपने आसपास के वातावरण से अवगत होते ही राधा समझ गयी थी कि वह बहुत दूर निकल आयी थी और अब उसे अँधेरा घिरने से पहले घर जल्दी -जल्दी लौटना होगा ।


राधा अभी सोच ही रही थी कि उसे कुछ अजीब सी आवाज़ सुनाई दी । जब उसने आवाज़ का स्रोत तलाशना चाहा तो उसके नेत्रों ने जो देखा ,उसका मस्तिष्क अपनी स्वयं की आँखों पर ही भरोसा नहीं करना चाहता था । उसने एक मछली को देखा और वह उड़ रही थी ।


राधा ने अपनी लकड़ियों का गट्ठर वहीँ छोड़ दिया और उसने उड़ती हुई मछली के पीछे -पीछे चलना शुरू कर दिया था ।कुछ देर बाद एक बड़ा सा बरगद का पेड़ दिखाई दिया । मछली जैसे ही पेड़ के तने के पास पहुँची ,तने पर एक दरवाज़ा सा उभर गया था और मछली उस दरवाज़े से अंदर प्रवेश कर गयी थी । दरवाज़े के विलुप्त होने से पूर्व ही राधा भी मछली के पीछे -पीछे दरवाज़े से एक नयी दुनिया में प्रवेश कर गयी थी ।


यह दुनिया बहुत ही खूबसूरत थी । पौधे फूलों से लदे हुए थे ,एक दिव्य ख़ुश्बू सब तरफ फ़ैली हुई थी । सूरज चमक रहा था ,रोशनी फैली हुई थी ;लेकिन सूरज की तपिश बिल्कुल महसूस नहीं हो रही थी । सेब के पेड़ों पर सेब लदे हुए थे । आम के पेड़ पर आम आ रहे थे ।संतरे,अमरुद ,चीकू ,नाशपति ,आड़ू आदि फलों के भी वृक्ष लगे हुए थे । सभी वृक्ष अपने फलों के बोझ से झुके हुए थे । राधा ने एक सेब तोड़ा और जैसे ही उसने खाया ,आज तक राधा ने उस स्वाद का कुछ नहीं खाया था । अर्जुन एक बार उसके लिए छिपाकर लाया था ,लेकिन वह इतना रसीला और मीठा नहीं था । राधा ने आम के पेड़ से आम भी तोड़कर खाया । आम और सेब खाने के बाद राधा का पेट इतना भर गया था कि वह और फल चखे बिना आगे बढ़ गयी थी ।


राधा ने आगे देखा कि शेर और हिरण एक ही नदी के किनारे पर खड़े होकर साथ -साथ पानी पी रहे थे । कुछ मछलियाँ नदी में अठखेलियाँ कर रही थी और कुछ हवा में उड़ रही थी । थोड़ा आगे जाने पर राधा ने देखा कि गाय ,कुत्ते ,भैंस आदि पशुओं की चौपाल सजी हुई थी । सभी पशु मनुष्यों के जैसे बात कर रहे थे । राधा के आश्चर्य की कोई सीमा नहीं थी । तब ही पशुओं के मुँह से राधा नाम सुनकर ,राधा चौंक सी गयी थी । उसने अपनी पाँचों इन्द्रियाँ उनकी बात सुनने में लगा दी ।


गाय ने कहा कि ,"नाग आज राधा के भाई अर्जुन को डसने जाना चाहता है । "


तब ही भैंस ने पूछा ," आज ही ?"


"हाँ ,उसकी मौत तो आज के दिन की ही लिखी थी । बस यह तय नहीं हो पा रहा था कि कैसे मारा जाए ?",कुत्ते ने जवाब दिया ।


"अब जब नाग ने इच्छा जताई है तो उसे अनुमति देकर एक तीर से दो शिकार क्यों न कर लिए जाए । ",गाय ने मुस्कुराते हुए कहा ।


"नहीं ,गाय माता ,ऐसा मत करिये । मेरे भाई को मत मारिये । ",अभी तक उनकी बातें छुपकर सुन रही राधा ने सामने आकर कहा । उसके आंसू आँखों से निकलकर कपोलों तक लुढ़क आये थे ।


"अरे ,यह लड़की कहाँ से आ गयी ?",कुत्ते ने कहा ।


"इसे तो हमारी इस दुनिया के बारे में पता चल गया ,इसे अब मारना ही होगा । ",भैंस ने कहा ।


"हाँ ,आप चाहे मुझे मार दो । लेकिन ,मेरे भाई अर्जुन को कुछ मत करना । मेरा मासूम भाई अर्जुन ,नागदंश को सह नहीं पायेगा । मुझे मार दीजिये ,लेकिन उसे कुछ मत कीजिये । ", राधा ने रोते हुए कहा ।


"इस लड़की ने मुझे माता कह दिया ,अब इसे तो नहीं मारा जा सकता । ",गाय ने कहा ।


"लेकिन ,फिर यह हमारे बारे में बाहर की दुनिया को बता देगी । ", कुत्ते ने कहा ।


"हम शेर को बुला लेते हैं । वह अपनी 'भूल जा दहाड़' का इस्तेमाल करेगा और यह लड़की सब कुछ भूल जायेगी । ",गाय ने सुझाव दिया ।


"माता ,मुझे कहीं नहीं जाना । मेरे भाई को कुछ मत करना । ",राधा रोते हुए कहती जा रही थी । रोते -रोते उसकी हिचकियाँ बँध गयी थी । उसका ह्रदय विदारक रुदन किसी का भी ह्रदय परिवर्तन कर सकता था ।


शायद यही वजह रही कि कुत्ते ने कहा ,"हमें इस लड़की की बात पर विचार करना चाहिए । "


तब ही भैंस ने कहा ," लेकिन तुम एक बात भूल रहे हो कि अगर नाग एक बार किसी को डसना चाहे तो उसे रोकना मुश्किल है । अगर नाग खुद ही देर से पहुंचे तब ही हम उसे रोक सकते हैं । "


"तुम्हारी बातों में दम है । ",गाय ने कहा और सोचने लगी ।


वहाँ उपस्थित सभी लोग गहन सोच -विचार में थे । तब ही राधा के दिमाग में एक योजना आयी और उसने कहा कि ," माता आप मुझे यहाँ से जाने की अनुमति दीजिये । मैं नाग के डसने के समय को टलवा दूँगी और विलम्ब होने पर आप उन्हें अर्जुन को डसने से मना कर देना । आपसे एक और निवेदन है कि आप तब तक के लिए मेरी यादादश्त बनाये रखे । मेरे ऊपर भूल जा दहाड़ का इस्तेमाल न करें । अर्जुन को बचाकर मैं खुद आपके पास आ जाऊँगी ,आप सब से यह मेरा वादा है । "


सबने आपस में विचार -विमर्श किया और उन्होंने राधा को यह कहते हुए जाने दिया कि ,"लड़की अभी से 12 घंटे बाद नाग अर्जुन को डसने के लिए पहुँच जाएगा । "


राधा उस जादुई दुनिया से तेज़ी से बाहर आयी और बिना रुके ,अपने घर की तरफ दौड़ लगा दी । घर पहुँचने के बाद ही वह रुकी । बाहर उसकी सौतेली माँ और पिताजी बैठे हुए थे । उसे देखते ही माँ ने कहा कि ,"मैंने तो सोचा था कि तू जंगल में मर -मरा गयी होगी । कल रात भर कहाँ थी ? किसके साथ गुलछर्रे उड़ा रही थी ?"


राधा बिना कुछ बोले घर के अंदर घुस गयी और मटका लेकर बाहर आयी । माँ का बोलना बदस्तूर जारी था । राधा ने इतना ही कहा कि ," आज -आज चुप हो जाओ । कल आपके सभी प्रश्नों का उत्तर दे दूँगी । आज मेरे किसी काम में कोई बाधा माँ डालो । "


राधा के कहने का अंदाज़ था या उसकी आँखों में कुछ बात थी ; उसकी माँ बिल्कुल चुप हो गयी थी और उसे एकटक देखे जा रही थी । उसने फुर्ती से अपने घर के सारे काम निपटा दिए ।उसके बाद राधा ने नाग को रोकने की योजना पर काम करना शुरू किया ।


नाग रात को आने वाला था । राधा ने अर्जुन के शयन कक्ष के बाहर नाग को रोकने की तैयारियाँ प्रारम्भ की । उसने सबसे पहले रेत की एक तह जमा दी । उसके बाद उसने फूलों का बिस्तर लगाया । उसके बाद उसने चन्दन से सुगन्धित रेशमी कपड़ों को लगाया । उसके बाद उसने एक दूध से भरा हुआ कटोरा रख दिया और उसके बाद उसने अपना बिस्तर बिछाया । सारी तैयारियां करते -करते शाम हो गयी थी । वह अर्जुन के सोन के बाद ,अपने बिस्तर पर आकर लेट गयी थी ।


नाग अपने समय पर अर्जुन को डसने के लिए आया । नाग रास्ते में मिली ठंडी -ठंडी रेत पर लोटने लगा ,फिर आगे फूलों के नरम बिस्तर पर लोट -पोट करने लगा । चन्दन से सुगन्धित रेशमी वस्त्रों ने नाग को मदमस्त कर दिया था । आगे जाकर नाग ने दूध के कटोरे से दूध पिया । नाग अब तक के स्वागत से आह्लादित था ,लेकिन क्यूंकि अर्जुन का मरना तो तय ही था ;वह उसे डसने के लिए आगे बढ़ा ।


आगे राधा उसका इंतज़ार कर रही थी और उसने हाथ जोड़कर निवेदन किया कि ," नागराज ,मेरे भाई को मत मारो । आप चाहो तो मुझे मार दो । आपका इतना स्वागत -सत्कार किया है तो आपसे इतना तो माँग ही सकती हूँ । "


नागराज ने फुँफकारते हुए कहा कि ,"लड़की ,यह तो नियति का लिखा हुआ है । इसमें मैं की कर सकता हूँ ?मेरे रास्ते से हट जा । "


लेकिन राधा अब तक अपनी योजना में कामयाब हो चुकी थी ,उसने नागराज के डसने के लिए तय समय को टाल दिया था । तब ही नागराज को अर्जुन को डसे बिना ,वापस लौटने के आदेश मिले । नागराज फुँफकारते हुए लौट गया । राधा की माँ और पिताजी दिल थामे ,यह सब देख रहे थे ।


नागराज के लौटते ही उन्होंने राधा को गले से लगा लिया था । तीनों गले लगकर रोते जा रह थे । किसी को कुछ कहने की ज़रुरत नहीं थी ,उनक आँसुओं ने ही सब कुछ कह दिया था ।


अगले दिन राधा सुबह -सुबह अपने वादे को पूरा करने के लिए यह कहकर चली गयी थी कि ,"माँ -पिताजी एक आखिरी काम रह गया है । उसे पूरा करके जल्दी ही वापस आ जाऊँगी । "


"इतने दिनों बाद मुझे माँ -पिताजी का स्नेह प्राप्त हुआ था ,लेकिन मेरी बदकिस्मती ने मुझे यहाँ भी नहीं बख्शा । ",ऐसा सोचते हुए राधा पेड़ के सामने पहुँच गयी थी ।


राधा के पहुँचते ही पेड़ पर दरवाज़ा उभर गया था । राधा फलों के पेड़ों ,मछलियों आदि को पार करते हुए कल वाले स्थान पर ही पहुँच गयी थी ।


उसे देखते ही गाय ने कहा ," लड़की तुम बुद्धिमान ही नहीं अपने वादे की पक्की भी हो । तुम्हें और तुम्हारे भाई दोनों को ही हम जीवन दान देते हैं । तुम आज कुछ भी माँग लो ,जो माँगोगी वह तुम्हें अवश्य ही मिलेगा । "


"माता ,आपका शुक्रिया । मेरे परिवार में आपसी स्नेह हमेशा बना रहे ,बस इतना ही चाहती हूँ । ",राधा ने विनम्रता पूर्वक कहा ।


"लड़की तुमने हमारा दिल जीत लिया । तुम जहाँ भी रहोगी वहां कभी किसी वस्तु की कमी नहीं होगी । जाओ .",सभी ने कहा .


'भूल जा दहाड़ ' के साथ ही राधा सब कुछ भूल गयी थी ।


"अरे बेटा उठ जा । तेरे लिए दूध बना दिया है ,दूध पी ले और तैयार हो जा । पाठशाला भी तो जाना है । ",राधा की माँ उसे जगा रही थी ।


जागने क बाद राधा तुरंत तैयार हो गयी थी । उसन माँ से पूछा ,"माँ ,फिर पानी लेने कौन जाएगा ?"


"तू चिंता मत कर । तू सिर्फ अध्ययन पर ध्यान लगा । ",माँ ने जवाब दिया ।


"राधा और अर्जुन आ जाओ बच्चों ,तुम लोगों को पाठशाला छोड़ आऊँ । ",पिताजी ने आवाज़ लगाते हुए कहा ।


"जी ,पिताजी आयी .", राधा दौड़ते हुए अपने पिताजी के पास गयी । पिताजी ने बड़े प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा और उसे एवं अर्जुन दोनों को पाठशाला छोड़कर आये ।


राधा बहुत खुश थी । उसे समझ नहीं आ रहा था कि सब कुछ एकदम से इतना कैसे परिवर्तित हो गया ?लेकिन जो भी हो रहा था ,अच्छा ही था ।


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