मुज़फ्फर इक़बाल सिद्दीकी

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मुज़फ्फर इक़बाल सिद्दीकी

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दुनिया की सैर (कहानी)

दुनिया की सैर (कहानी)

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दुनिया की सैर करने की कल्पना मात्र ही, रोमांचित कर देती है। पुरातन काल में अनेक नाविकों और पर्वतारोहियों और दूसरे यात्रियों ने कभी पैदल तो कभी साइकिल से अनेक यात्राएँ कीं और उनके सकरात्मतक परिणाम भी आए। यात्रा करना और नई-नई खोजें करना इंसान की प्रकृति में हैं। उसकी प्रकृति ही कुछ ऐसी है कि प्रकृति को जान ने समझने की उसकी जिज्ञासा कभी शान्त नहीं हुई। 

जितेन्द्र को बचपन से ही विदेशी कहानियाँ पढ़ने और उनकी सँस्कृति जान ने समझने का बहुत शौक था। उन कहानियों के माध्यम से उसे बहुत रोचक प्रसंग पढ़ने को मिले। यही कारण था कि स्कूल की भूगोल और इतिहास की किताबें उसे पढ़ने में हमेशा अच्छा लगता। लेकिन बचपन के शौक तो शौक तक ही सीमित होते हैं। रोज़गार के अवसर तो तकनीकी पढ़ाई के द्वारा ही मिल पाते हैं। ऐसा उसके पिताजी का मानना था। लेकिन जितेन्द्र किसी भी कीमत पर अपने शौक त्यागने को तैयार न था। तभी तो माँ ने एक दिन समझाते हुए कहा। 

- बेटे, अभी पिताजी की बात मानने में कोई हर्ज नहीं है। एक बार तू पढ़ लिख कर नौकरी से लग जाए। फिर सारी ज़िन्दगी पड़ी है। कर लेना अपने अरमान पूरे। 

- लेकिन माँ, मेरा उद्देश्य बहुत सारी धन-दौलत कमाना नहीं है। मुझे तो केवल इस दुनिया के रहस्य को जानने, समझने की एक जिज्ञासा है। वही मेरा सपना भी। 

- तेरे इस सपने को पूरा करने के लिए भी तो ढेर सारे रूपये-पैसे की भी जरुरत होगी। ऐसे ही थोड़ी कोई तू पैदल चल देगा। अगर चला भी गया तो पेट-पूजा कैसे होगी। और तेरा सपना ही क्यों? तेरे पिताजी का और हमारा भी तो एक सपना है। तू इस दुनिया में पढ़ लिख कर एक अच्छा इंसान बने। तुझे अच्छी नौकरी मिले। अभी कुछ दिन की ही तो बात है। पढ़ लिख कर एक अच्छी सी नौकरी कर लो। फिर पैसे इकट्ठा कर के चल पड़ना विश्व यात्रा पर। 

माँ की बात समझ में आ गई थी। अभी पिताजी की बात मान ने में ही भलाई थी। फिर भी कॉलेज की पढ़ाई पूरी करते-करते, कॉलेज टूर के द्वारा उसने अपने देश के तमाम टूरिस्ट प्लेस घूम लिए थे। जब कहीं भी कॉलेज के टूर जाता उसकी सहपाठिन दिव्या उसके साथ होती। दिव्या को भी जितेन्द्र के साथ रहते-रहते दुनिया को जानने समझने का शौक जाग गया। किस्मत अच्छी थी दोनों को अच्छे पैकेज के साथ नौकरी भी लग गई। 

- देख माँ, अब मैं ने एक आज्ञाकारी पुत्र का धर्म निभा दिया। अब मुझे कुछ करने से मत रोकना। 

- बेटे रोक कौन रहा है। हर माता-पिता का कर्तव्य होता है उसकी संतान पढ़ लिख कर अच्छी नौकरी करे। और गृहस्थ जीवन में प्रवेश करे। 

- अब आप ने ये गृहस्थ जीवन की बात क्यों निकाल दी। मैं आप लोगों को स्पष्ट बता देता हूँ। मुझे शादी अभी नहीं करनी। 

- बेटे करना तो पड़ेगी ही। कभी न कभी। पता नहीं हम लोग तब तक होंगे या नहीं भी। तू अच्छा अपनी मर्जी से ही सही। कोई लड़की तेरी नज़र में हो तो बता। नहीं तो हम ढूंढते हैं। 

- माँ जब मुझे शादी ही नहीं करनी तो फिर मेरी नज़र का तो प्रश्न ही नहीं उठता। 

लेकिन ये बात उसने अपनी दोस्त दिव्या को भी फ़ोन पर भी बता दी। दिव्या मन ही मन उसे चाहने लगी थी। उसने जितेन्द्र की बात का कोई जवाब नहीं दिया। 

- क्या बात है दिव्या तुम तो जानती हो मेरे सपने। फिर बताओ न, मैं माँ को कैसे समझाऊँ ?

- वैसे जितेन्द्र, माँ ठीक ही तो कहती है। 

- लेकिन अगर कोई ऐसा इंसान मिला जिससे मेरे और उसके विचार नहीं मिले तो फिर मेरे सपने तो अधूरे ही रह जायेंगे। 

- एक बार ढूँढ के देख लो। शायद कोई मिल जाए। -दिव्या नहीं चाहती थी कि वह खुद से आगे आकर कहे।

- फिर दिव्या तुम तो मुझे अच्छी तरह जानती हो ...?

- क्या मतलब, जितेन्द्र?

- नहीं मैं तो ऐसे ही सोच रहा था ... कि !!! 

- क्या... ? खुलकर कहो न। 

- दिव्या मैं तुमसे प्यार करता हूँ। लेकिन हो सकता है तुम्हें मेरे सपने सब की तरह तुम्हें भी अच्छे न लगते हों। इसलिए मैं ने कभी कहा नहीं। क्या हम दोनों ... ? 

- दूसरी तरफ खामोशी थी?

- बोलो न दिव्या तुम्हारा क्या कहना है। मैं जानना चाहता हूँ। 

- जितेन्द्र अभी मैं बिज़ी हूँ। हम कल बात करते हैं। 

आखिरकार, दिव्या मान गई। शादी के बाद पहला प्लान ही दोनों ने हनीमून का एम्स्टर्डम का बनाया। पासपोर्ट वीज़ा की सारी दिक्कतों को पार करते हुए एम्स्टर्डम पहुँच गए। वहाँ से आस-पास यूरोप के सभी देश भी घूम लिए। इसी बीच दोनों ने अपने विडिओ यू-ट्यूब पर शेयर किये। बहुत लोगों ने उनको न केवल लाइक किया बल्कि कमेंट भी किये। इससे इनका हौसला बढ़ गया। अब की बार तो दोनों ने "यात्री दोस्त जितेन्द्र" के नाम से एक ब्लॉग ही बना लिया। अपने-अपने ऑफिस से लॉन्ग लीव लेकर दोनों चल पड़े। विश्व की यात्रा पर। 

जितेन्द्र जिस देश भी जाता। वहाँ की संस्कृति, और खान-पान की विस्तृत चर्चा कर रिकॉर्डिंग करके यू-ट्यूब पर डाल देता। दिव्या रिकॉर्डिंग खुद ही करती। और उस स्थान विशेष के स्थायी लोगों से मिलकर संस्कृति सम्बन्धी सारी जानकारियाँ इकट्ठा करती। अब तो उनको सब्सक्राइबर्स भी बहुत मिल गए थे। और ऐड मिलने से आय का स्रोत भी। 

जितेन्द्र का शौक उसकी रोज़ी-रोटी का जरिया भी बन गया था। दिव्या पत्नी ही नहीं बल्कि एक अच्छे दोस्त की तरह हर क़दम पर उसके साथ थी।  

अब तक जितेंद्र और दिव्या अनेक देशों की यात्रा कर चुके थे। लेकिन पूरे विश्व का मिशन अभी बाकी था। 



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