दोस्ती का ऐसा रूप
दोस्ती का ऐसा रूप
आज एक प्रतिष्ठित लेखक की कहानी पढ़ते-पढ़ते, कब बचपन में पहुंच गई, पता ही नहीं चला। यह उस समय की बात है, जब मैं 11वीं कक्षा के विद्यार्थी थी, और विद्यालय में वार्षिकोत्सव के अवसर पर विभिन्न प्रतियोगिताएं आयोजित की जा रही थी। उनमें से एक प्रतियोगिता का ऑर्गेनाइजर मुझे बनाया गया था। जब प्रतिभागी प्रतियोगिता के लिए अपने नाम दे रहे थे, तभी एक छात्रा ने आकर, मुझसे अपनी मित्र मंडली की दो छात्राओं के नाम प्रतियोगिता से हटाने के लिए कहा, और उसका खुद का नाम लिखने के लिए कहा, फिर मुझसे कहा, कह देना, कुल दस प्रतिभागी के नाम आ चुके थे, अतः इस प्रतियोगिता में उनका नाम लिया नहीं जा सका। उस छात्रा को मैं, बिना कुछ कहे एकटक देखती रही। धीरे-धीरे दोस्ती शब्द से डर लगने लगा। लगा अगर हम किसी को मित्र बनाएंगे, तो वह हमारे आगे बढ़ने में सबसे बड़ी रुकावट बनेगा। खैर, सबक तो उस छात्रा को सिखाना ही था, अतः उसकी इस करतूत पर से पर्दा हटाने के लिए, सबसे पहले मैंने अध्यापिका को, फिर उसके सभी साथियों को, उसकी इस हरकत से अवगत कराया, क्योंकि मुझे अपने मन में दोस्ती शब्द को लेकर उत्पन्न हुए डर को हमेशा के लिए दफनाना था, परिणामस्वरूप उसने अपने अच्छे-भले मित्रों का न सिर्फ साथ खोया, वरन अकेलेपन से अंत में टूटी वह अलग।
