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Charumati Ramdas

Others


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धनु कोष्ठक (एक अंश)

धनु कोष्ठक (एक अंश)

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लेखक : सिर्गइ नोसव

अनुवाद : आ. चारुमति रामदास


01.08


शॉवर. टॉयलेट. नींद नहीं आएगी. वह पढ़ता रहेगा.

01.20


लेट गया.  नोटबुक खोली.

पहला पैरेग्राफ़.

01.21


और फिर से – शुरू से. क्योंकि समझना कठिन है.


01.22


और फिर से – क्योंकि वाक़ई में कठिन है:


{{{ ये तीसरा हफ़्ता है जबसे मैं - - : कन्स्तान्तीन अन्द्रेयेविच मूखिन हूँ, उम्र उनचालीस साल, किन्हीं चीज़ों का स्पेशलिस्ट, शादी-शुदा, मिलनसार, प्रिय खाद्य पदार्थ - - : फ़्राईड वेजिटेबल कबाब; एक्स्ट्रा वज़न 8 किलोग्राम. अपरिहार्य प्रश्न - - : तब मूख़िन का क्या? क्या उसे मालूम है कि मूखिन वह नहीं, बल्कि मैं हूँ? उत्तर नकारार्थी है - - : नहीं. मूख़िन नहीं जानता और जानने योग्य भी नहीं है, जैसे कि ये न जानने योग्य भी नहीं है, अपनी स्वयम् की अनुपस्थिति के कारण, मैं हो जाने के कारण. जब मूखिन के स्थान पर मैं हूँ, तब वह नहीं है. मूख़िन तब मूखिन बनेगा, जब मैं मूखिन होना बन्द कर दूँगा. उम्मीद करता हूँ कि कभी मूखिन होना समाप्त कर दूँग़ा, क्योंकि मूखिन होना क़िस्मत का खेल है. - - प्रश्न - - : मैं मूखिन होना कब बन्द करूँगा? - - : उत्तर - - : उत्तर नहीं दूँगा; वह मेरे अधिकार क्षेत्र से बाहर स्थित है. }}}        

कपितोनोव इलेक्ट्रिक केटल चालू करता है. बाथरूम जाकर एक बार फिर मुँह धोता है – पहले के शॉवर के अतिरिक्त.

कपितोनोव शांत है. वह स्वस्थ्य है और पूरे होश में है. वह ‘नोट्स’ को ग्रहण करने और उसकी मीमांसा करने के लिए तैयार है.

01.28


{{{ पहले वाला ‘नोट’ परीक्षण के तौर पर लिखा था. मैं धनु-कोष्ठकों की विश्वसनीयता परखना चाहता था. जाँच सफ़ल रही. कोई भी सन्देहास्पद चीज़ नहीं देखी गई. दो घंटों के ‘मैन्टेनेन्स-ब्रेक’ के बाद फिर से लिखना जारी करता हूँ.

फ़िलहाल मुझे, मोटे तौर पर, जो हो चुका है, और जो हो रहा है उसका सार प्रस्तुत करना है. काम आसान नहीं है. मगर किसने कहा था, कि आसान होगा? कोशिश करूँगा. अगर सफ़ल हुआ, तो आगे बड़ा आसान होगा; मुझे इस पर यक़ीन है.

तो बात ये है.


बुधवार को मैं स्वयम् को मूख़िन महसूस कर रहा था, मगर गुरुवार को महसूस किया कि ये मेरा भ्रम था. ये प्रतिस्थापन तो काफ़ी पहले हो चुका था. मगर कब? जैसा कि आज, लक्षणों को याद करते हुए, मैं समझ गया कि प्रतिस्थापन पिछले से पिछले सप्ताह हुआ था, और अगर आज से उलटी गिनती करूँ तो - - : अठारह दिन पहले, उस दिन को गिनें तो. अजीब बात ये है कि इस गुरुवार तक मैं वाक़ई में स्वयम् को, मूखिन की तरह, असली मूखिन मान रहा था, जैसे कि प्रतिस्थापन हुआ ही न हो. ये बीच वाला समय ज़्यादा लम्बा खिंच गया, मगर अब सब गुज़र चुका है.


एक बार फिर से ‘पॉइन्टस’ के अनुसार.

1.    ढ़ाई हफ़्ते पहले प्रतिस्थापन हुआ. बाह्य नियंत्रक शक्ति के माध्यम से ‘ऑब्जेक्ट’ मूखिन का मूखिन होना बन्द हो गया, और वह ‘सब्जेक्ट’ ‘मैं’ बन गया, जो तब तक नहीं समझ रहा था, कि मैं मूखिन नहीं हूँ, और उसी मूखिन द्वारा स्वयम् को प्रतिस्थापित कर चुका हूँ. रूपांतरण की प्रक्रिया पन्द्रह दिन चली, इस गुरुवार तक, और इन पन्द्रह दिनों में, सबसे महत्वपूर्ण रहकर, हालाँकि अनेक स्तरों वाली स्कैनिंग सिस्टम का निष्क्रिय तत्व होते हुए, मैं अनजाने ही रिवर्स ट्रेंचिंग का उद्देश्य पूरा करता रहा.

2.    गुरुवार को मुझे इस बात का अर्थ समझ में आया कि पिछले से पिछले हफ़्ते क्या हुआ था - - : मैं समझ गया कि वास्तविकता में मैं कौन हूँ. ज़्यादा सही होगा ये कहना, मैं इस बात को ज़्यादा अच्छी तरह समझ गया कि सबसे पहले मैं कौन नहीं हूँ - - : सैद्धांतिक रूप में मूखिन नहीं हूँ. जवाब देना मुश्किल लग रहा है, या तो वह सबकी भलाई के लिए हो या स्वयम् मेरे लिए हानिकारक हो, मैंने यही समझा है. मैं मानता हूँ कि प्रोजेक्ट के उद्देश्यों की दृष्टि से, जिन्हें मैं भी काफ़ी हद तक समझ नहीं पाया हूँ, मूखिन से भिन्न ‘सब्जेक्ट’ के तौर पर मेरे अपने बारे में अनुमान, न केवल किन्हीं संभावनाओं की खोज करेंगे, बल्कि वे किसी की समस्याओं से भी ग्रस्त हैं, और सच कहा जाए तो मेरी स्वयम् की समस्याओं से ग्रस्त हैं. चाहे जो भी हो, मुझे विश्वास है - - : मेरे द्वारा स्वयम् को मूखिन से भिन्न समझना, जिसने मूखिन को प्रतिस्थापित कर दिया है, प्राकृतिक विकास का कृत्य नहीं है, बल्कि ये नियंत्रक शक्ति द्वारा मुझे भेजा गया है.

3.    उसी पल मुझे सामान्य उद्देश्य की लगभग सभी सीमाओं का प्रतिनिधित्व दिया गया और सभी संभव क्षेत्रों के सहभागी की ज़िम्मेदारियों से अवगत कराया गया. बात हो रही है सीमाओं की, न कि ख़ुद उद्देश्य की, जिसका सार जानने की, ज़ाहिर है, मुझे इजाज़त नहीं है. साथ ही मुझे कुछ प्रमुख अवधारणाओं को समझने का काम दिया गया, जिनके बगैर मैं इस अर्थ को समझ ही नहीं पाता; ये अवधारणाएँ हैं - - : प्रोजेक्ट, नियंत्रक शक्ति, रिवर्स ट्रेन्चिंग, स्कैनिंग सिस्टम, संशोधक. साथ ही मुझे प्रतिबन्धों की, सीमाओं की, अनुमतियों की कल्पना दी गई. सबसे पहले मुझे मेरे द्वारा अवगत इस अर्थ को छुपाना होगा और किसी भी तरह से ये ज़ाहिर नहीं होने देना होगा, कि मैं मूखिन नहीं हूँ - - : न तो मौखिक रूप से, न ही लिखित में. मुझे ज्ञात है कि मैं इन प्रतिबंधों का उल्लंघन कर रहा हूँ - - : अभी, स्वयम् को उस सार को प्रदर्शित करने की अनुमति देकर, जिसे मैं ख़ुद ही पूरी तरह समझ नहीं पाया हूँ.

4.    इस समय, ऊपर निर्दिष्ट को समझने के तीसरे दिन, मैं, स्वयम् को उस सार को प्रकट करने की अनुमति देकर, जिसे मैं ख़ुद ही पूरी तरह समझ नहीं पाया हूँ, प्रतिबंध का उल्लंघन कर रहा हूँ. मैं प्रतिबंध का उल्लंघन कर रहा हूँ, ये अपना ही विनीत पाठक होने के कारण मुझे स्पष्ट रूप से विदित हो गया है. मगर मैं बिना डरे प्रतिबंध का उल्लंघन कर रहा हूँ, बिना किसी सम्मान के, बहादुरी से, क्योंकि मुझे उस क्षेत्र का पता चल गया है, जो नियंत्रक शक्ति के अधिकार में नहीं है और जो संशोधक की नज़र से भी आज़ाद है. ये है मेरा आविष्कार - - : तिहरे धनु-कोष्ठकों का ऑपरेटर - - : {{{- - - - - }}}. अविश्वसनीय लगता है, मगर ये ऐसा ही है - - : अगर इबारत को तिहरे धनु-कोष्ठकों के बीच रख दिया जाए, तो नियंत्रक शक्ति को पता भी नहीं चलेगा! सरल और बुद्धिमत्तापूर्ण! मैं क़रीब-क़रीब ख़ुशनसीब हूँ. ये नहीं समझाऊँगा कि मुझे नियन्त्रक शक्ति के इस अंधेरे कोने का पता कैसे चला; कई महान आविष्कारों के समान, मेरा आविष्कार भी संयोगवश ही (Incidental Case) प्रतीत हुआ. मैंने पुनरुक्ति का प्रयोग तो नहीं किया - - : “Incidental Case”? वैसे, “केस” ही तो घटना (Incident) होती है ना? मगर मैं पुनरुक्ति से नहीं डरता. चाहे जो भी घटित हुआ हो, एक घटना ज़रूर उत्पन्न हो जाती है. घटना की नियती ही है घटित होना, इसीलिए वह घटना है! “केस” प्रतीत होती है - - : ‘केस’ प्रतीत होती है - - : विश्वसनीयता सहित, न कि आवश्यकता सहित. ‘केस’ और घटना के बीच अंतर ये है - - : घटना प्रतीत नहीं होती, मगर ‘केस’ घटित हो सकती है. ‘केस’ ज़्यादा गतिमान और लचीलापन लिए होती है. इसलिए मैं इस बात से सहमत हूँ, कि इसे ‘केस’ कहेंगे, बहस नहीं करूँगा, ऊपर से बहस भी अपने आप से. ‘केस’ घटित हुई. धनु-कोष्ठक - - : संयोगवश! - - : विस्मयकारक गुणों वाले. मैंने अदृश्य होने का तरीक़ा ढूँढ़ लिया - - : लिखाई में. क्या इस आविष्कार से मुझे कुछ प्राप्त होगा? हाँ, मगर थोड़ा सा. आज़ादी का स्तर; सबसे निचला स्तर, मगर फिर भी - - : मुझे! किसी और को नहीं, बल्कि मुझे. मूखिन को नहीं - - : मुझे! मैं समझने की कोशिश कर सकता हूँ, कि मैं कौन हूँ, क्यों मैं मूखिन नहीं हूँ, और क्यों सिर्फ मूखिन को मैंने पिछले से पिछले हफ़्ते प्रतिस्थापित किया, और क्या प्रतिस्थापन के भविष्य के बारे में मेरे अनुमान विश्वसनीय हैं, जिनके बारे में अभी बताने की मेरी कोई इच्छा नहीं है - - : शब्दों से खेलने की मेरी उल्लासदायी एवम् लुभावनी योग्यता के बावजूद, जो उम्मीद करता हूँ कि समझने में आसान है ( ओह, वह मुझे बेहद, बेहद समझ में आती है, आख़िर ख़ुद को कैसे नहीं समझूँगा?). इस समय, तीन धनु-कोष्ठकों के भीतर रखकर, मैं चाहे जो भी लिखूँ, उसमें कोई संशोधन न कर पाएगा. मैं अदृश्य हूँ. मेरा उल्लासोन्माद बाह्य शक्तियों के लिए अप्राप्य है, चाहे उन्होंने अपने ज़माने में मेरे दिमाग़ में कितनी भी शाख़ाएँ क्यों न खोल रखी हों! मगर अपने आविष्कार का दुरुपयोग मैं नहीं करूँगा. असल में वह कुछ नहीं बदलेगा. मैं बेवफ़ा नहीं हूँ; मैं विश्वासघाती नहीं हूँ; मैं किसी उद्देश्य को समर्पित हूँ, चाहे मैं ये भी नहीं जानता होऊँ कि किस उद्देश्य को. बस - - : ...धनु-कोष्ठक, तिहरे - - ...कितना अच्छा है ये! - - : ...ख़ास बात - - : उन्हें बन्द करना नहीं भूलना चाहिए - - : ...कल्पना करने में भी डर लगता है कि अगर भूल गया तो - - : ...सब ख़तम! शुरूआत के लिए काफ़ी है. मैं बन्द करता हूँ.}}}                         



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