दान
दान
प्रताप नामक एक राजा अपने गुरू को सत्कार करने के समय एक रेश्मी धोती दान मे दिया। गुरू बहुत खुश होकर घर वापस जान को तयार हो गया। मार्ग में एक गरीब बूढा सर्दी से कांप रहा था। उस पर दया आ गई, अपने रेश्मी धोती को गुरू ने उस बूढ़े को दान कर किया।
अगले दिन राजा उस बूढ़े को देखा बहुत क्रोधित हुआ।
फिर उसने गुरू को एक सोने का कंगन दिया,गुरू ने इस कंगन को एक राजोद्योगी की बेटी की शादी के लिए दे दिया।राजा ये विषय जानकर गुरू को बुलाया और पूछा कि "आप ने मुझे अमर्यादित किया है ,जो मैंने आपको दान दिया था आप तो अपनी मर्जी से किसी और को दे दिया ?"तुरंत गुरू ने जवाब दिया कि दान में दिये गये वस्तु को आप अभी भी याद रखकर अपना समझ कर मुझे बुलाए हैं। इसी तरह के दिये दान का फल नहीं मिलेगा। अगर दान दिया है तो इसके बाद उन चीजों पक आपका कोई अधिकार नहीं होगा और जो चीजें आप ने मुझे दिया है उसका उपयोग इन लोगों के पास है, इसलिए मैंने दे दिया।जहाँ वस्तु का उपयोग है वहाँ ही रहना उचित है। राजा शांत हो गया।
