STORYMIRROR

Kunda Shamkuwar

Others

3  

Kunda Shamkuwar

Others

बदला बदला सा मैं

बदला बदला सा मैं

2 mins
343

एजुकेशन के सिलसिले में मुझे शहर के हॉस्टल में और बाद में नौकरी के लिए उस से भी दूर किसी बड़े शहर में जाना पड़ा।अपनी ऑफ़िस की व्यस्तता और फिर देश विदेश में आना जाना चलता रहा।जिंदगी काइंड ऑफ़ स्टेबल हो गयी थी।

बहुत सालों के बाद इस बार घर जाना हुआ।मैं कोट पैंट और टाई लगाकर बड़ी शान से गाँव गया।"अरे चाचा, कैसे हो? क्या चल रहा है? सवाल करते और जवाब देते हुए मैं आगे बढ़ता गया।

गाँव के लोग बिल्कुल वैसे ही लग रहे थे अलबत्ता मैं कहाँ से कहाँ पहुँच गया था।इतने अरसे के बाद घर जाने पर माहौल थोड़ा अलग ही लग रहा था।बड़े भाई ने प्यार से घर परिवार के बारे में पूछताछ की।सबका हालचाल भी पूछा।

मैंने कहा,"और बाकी के लोग कहाँ है?घर खाली खाली क्यों लग रहा है?" भाई साहब कहने लगे,"हम सब लोग अपने खेत में जाते है। आज तुमने आना था तो मैं रुक गया हूँ।थोड़ी देर में आ जाएँगे सब लोग।"

मैंने झिझकते हुए बोला,"कोई बात नहीं,मैं भी चलता हूँ,खेत देख कर आते है।"

"अरे,रुको,चाय तो पी लो।" भाई साहब कहने लगे।

मैंने कहा,"नहीं पहले घरवालों से मिलकर आते है।खेत भी देख लेते है।चाय बाद में सबके साथ पी लेंगे।"हम दोनों बातें करते करते खेत में गए।घर के लोग दूसरे लेबर्स के साथ काम कर रहे थे।मुझे देखकर सब लोग मेरे पास आये और बड़ी गर्मजोशी से हालचाल पूछने लगे।और भी कई सारी बातें होने लगी।

मुझे बड़ा अचरज हो रहा था।उन बातों में बहुत गर्माहट थी।शहर में वहाँ के कल्चर के हिसाब से नपेतुले अंदाज़ में बोलना होता है।मैं सब कुछ देखता रहा।"अरे,चाचा जी को भूख लगी होगी,चलो हम सब घर चलते है।"कहते हुए विकास,भाई साहब के बेटे ने मेरा हाथ पकड़ लिया और साथ साथ चलने लगा और लेबर को बाकी काम करने की हिदायत देकर सब लोग घर की तरफ निकल पड़े।

भाभी चाय लेकर आयी।बिना दूध की उस काली चाय को मैं कितने सालों के बाद पी रहा था।उस चाय का टेस्ट मुझे इतने सारे देश विदेश के बड़े बड़े हॉटेल की चाय से बहुत अलग और अच्छा लगा।

मैं अपनी ही दुनिया और अपने परिवार मे मशगूल होता रहा और इन सब लोगों को बिल्कुल ही भूल गया।घर के हालातों को देखकर मुझे कुछ अंदाजा हुआ।कितना लापरवाह रहा मैं इतने साल।


मैं फ्रेश होने के लिए अंदर जाने लगा।आगे बढ़ते हुए अलमारी के शीशे में मुझे मेरा अक्स नज़र आया।मैं उसमे बदला हुआ सा लगा।कौन बदल गया?मेरे जहन में एक सवाल कौंध गया। मैं या फिर ये अक्स दिखानेवाला शीशा?


मेरे दिलदिमाग की कशमकश बढ़ गयी और मैं आँगन में पड़ी एक चारपाई पर चेहरे को हाथों से ढक कर लेट गया....


Rate this content
Log in