औरतखोर
औरतखोर
मैडम, आदमखोर किसे कहते हैं?"
--उस जीव -जंतु को जो मनुष्य को खाते हैं।
"क्या प्रकृति ने उन्हें ऐसा बनाया है?"
--नहीं, लंबे समय तक भूखे रहने की वजह से वे किसी मनुष्य का शिकार करते हैं फिर उसका खून -मांस उन्हें इतना पसन्द आ जाता है कि वे धीरे- धीरे उसके आदी हो जाते हैं।
उस बच्ची को आदमखोर की जानकारी देते हुए मेरे दिमाग में एक और शब्द उभर आया 'औरतखोर'।
और मुझे अतीत की कई कहानियां याद आ गईं। देखी-दिखाई, सुनी -सुनाई तो कुछ भोगी हुई।
मैं अतीत के पन्ने पलटने लगी।
मैं अंजना से उन दिनों मिली थी, जब इस छोटे शहर में भी लड़कियों का पैंट पहनना अपराध से कम न था, पर वह पैंट-शर्ट पहनती थी। उसके भूरे, रूखे बाल हमेशा खुले रहते। वह साइकिल चलाती हुई किसी भी सभा-सेमिनार में पहुँच जाती। मर्दों के बीच वह बेवाकी से बोलती। उनसे इस तरह बहस करती कि मैं उसका मुंह देखती रह जाती थी। मैं एक ऐसे कस्बे से आई थी, जहां लड़कियों का पढ़ना-लिखना, साईकिल चलाना, लड़कों से किसी भी बात में बराबरी करना वर्जित था। खान-पान से लेकर वस्त्र, शिक्षा और आचरण सब पर लैंगिक भेदभाव हावी था। एक तरह से लड़कियों को अछूत, अभिशाप व हीन मानने की परंपरा थी। ऐसे विभेद के वातावरण व संस्कार में पली-बढ़ी, हीन-भावना से ग्रस्त मैं उसे देखकर चौंक पड़ी थी। पाबंदी के कारण मैं साइकिल चलाना नहीं सीख पाई थी और पुरूषों से बात करना भी मुझे नहीं आता था, इसलिए वह मुझे और भी अचंभित करती थी। वह इसी शहर की रहने वाली थी पर कम पढ़ी -लिखी थी और मैं कस्बे से शहर पी-एच0डी करने आई थी।
वह भी मेरी ही तरह कविताएँ लिखती थी, इसलिए अक्सर किसी न किसी गोष्ठी में मेरी उससे मुलाकात हो जाती थी। शुरू में वह मुझसे घुलती- मिलती नहीं थी। हमेशा एक दूरी बनाकर बैठती। कभी -कभार हाय- हल्लो बस। उन दिनों साहित्यिक/गोष्ठी-सेमिनारों में महिलाओं की बहुत ही कम उपस्थिति होती थी। यूँ कहें कि उनका घर से बाहर निकलकर मर्दो के क्षेत्र में आना -जाना अच्छा नहीं माना जाता था। प्रगतिशील कहे जाने वाले कवि- लेखक भी अपने घर की स्त्रियों को ऐसे किसी कार्यक्रम में शिरकत की इज़ाजत नहीं देते थे। वे रिश्ते -नाते के विवाह- समारोहों या पारिवारिकों -उत्सवों में शामिल हो सकती थीं । परिवार के पुरूष -सदस्यों के साथ कभी -कभार कोई पारिवारिक या धार्मिक फिल्म देख सकती थीं। मंदिरों, तीर्थों आदि में उनके साथ जा सकती थीं। स्कूल-कॉलेज में भी पूरी पर्देदारी के साथ जाने की इजाज़त मिल गई थी, पर पुरुषों की तरह या मनमर्ज़ी कपड़े पहनने, फैशन करके घर से बाहर निकलने की इज़ाजत बिल्कुल नहीं थी। जुबानदराजी, चंचलता व चटोरपन लड़की के अवगुण माने जाते थे। ये सब मेरे कस्बे में तो चरम पर था, पर इस शहर में भी कभी न कभी दिख ही जाता था। यहां कुछ बदलाव, थोड़ी प्रगति जरूर थी पर पुरूष मानसिकता में कोई फ़र्क नहीं था।
लड़कियों का बाल कटाना या बाल खोलकर बाहर निकलना भी उन्हें बिगड़ी लड़की की श्रेणी में लाकर खड़ा कर देता था। शहरों में शिक्षित और संपन्न घर की लड़कियां जरूर सिनेमा की अभिनेत्रियों जैसे फैशनबुल कपड़ों में दिख जाती थीं पर उन्हें आम लड़की की तरह न तो पैदल चलना होता था, न उन पर टिप्पड़ी करने की किसी में हिम्मत थी। हम मध्यम वर्ग की लड़कियों के लिए वे साक्षात हीरोइनें होती थीं, जिन्हें देखने के लिए हम तरस जाती थीं। उन्हें इस तरह देखकर हमें कौतुक होता था। वे हमारे लिए किसी परी या राजकुमारी से कम नहीं होती थीं।
मुझे याद है, जब कस्बे के एकमात्र इंटर कॉलेज में कक्षा छह में मेरा एडमिशन हुआ था, तब अम्मा को इसके लिए पास -पड़ोस, नात -रिश्तेदारों का कितना विरोध झेलना पड़ा था। उस कॉलेज में सहशिक्षा थी, यही विरोध का सबसे बड़ा कारण था। सबका मत था कि लड़कों के कॉलेज में पढ़ने से लड़कियाँ बिगड़ जाती हैं। कस्बे में मारवाड़ी बहुत थे और वे अमीर भी होते थे पर उनके वहां यह जाहिली बहुत ज़्यादा थी, इसलिए उन्होंने अपनी लड़कियों को इस कॉलेज में पढ़ने के लिए नहीं भेजा। वे अपनी लड़कियों को घर पर ही पढ़वाकर प्राइवेट छात्रा के रूप में हाईस्कूल की परीक्षा दिलवा देते थे। लड़की का दसवीं पास होना ही उस समय के लिए बड़ी बात थी।
जब मैं नवीं कक्षा में पहुंची, उसी समय मारवाड़ियों की पहल पर वहां एक गर्ल्स इंटर कॉलेज खुला, साथ ही लड़कियों की शिक्षा का द्वार भी। मेरे पड़ोस की मेरी समवयस्क दो लड़कियां संजना और अर्चना भी उसमें पढ़ने लगीं। संजना बड़े घर की बेटी थी और अर्चना छोटे घर की। यह बड़ा -छोटा जातिगत के साथ अर्थगत भी था। दोनों के ही घरवालों के लिए मैं ठीक लड़की नहीं थी क्योंकि मैंने लड़कों के कॉलेज में पढ़ना जारी रखा था ।
उन दिनों अम्मा मेरे बालों में तेल लगाकर दो पटिया चोटी इतने कसकर बांध देती कि वह तीन दिन तक नहीं खुलती थी। मैं वैसे ही स्कूल जाती। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता था क्योंकि घर में लड़कियों को ज्यादा शीशा देखना या क्रीम- पाउडर लगाना सख्त मना था। अम्मा का अफगान स्नो आलमारी में बंद रहता। जब अम्मा को किसी विशेष जगह जाना होता, तब वह साबुन से मुँह धोकर वह क्रीम लगाती। क्रीम लगाते ही माँ का गोरा रंग और भी निखर आता। उस समय मैं अपने सांवले हाथ- पांव देखती और माँ की तरह सुंदर होने की तरकीबें सोचती। उन दिनों लिपिस्टक लगाना और ब्रा पहनना भले घर की औरतों का लक्षण नहीं माना जाता था। मैंने माँ को कभी ब्रा पहने नहीं देखा। वैसे भी माँ का सुडौल फीगर सिर्फ ब्लाउज में भी हमेशा सुंदर ही दिखता पर पास -पड़ोस की दुबली -पतली औरतों का साड़ी के ऊपर से दिखता ढलका स्तन मन में वितृष्णा जगाता था। एक लंबी -चौड़ी, बूढ़ी विधवा मतवा तो मुझे आज भी याद आती हैं, जो सिर्फ सर्दियों में ही झुल्ला (ढीला ढाला कमर तक का पूरी बांह वाला ब्लाउज)पहनती थीं। बाकी दिनों सिर्फ साड़ी। वे मेरे घर अक्सर आतीं । जब वे चलतीं तो साड़ी से ढका उनका विशाल स्तन ऐसे हिलकोरे लेता कि हम बहनों के लिए मनोरंजन का विषय हो जाता। साथ ही शर्म भी आती कि उन्हें इसका अहसास क्यों नहीं है? बाद में पता चला कि उनकी जाति- विशेष की विधवा को एकवस्त्र ही धारण करने की इजाजत है। जवान विधवा भी साड़ी से ही सीने और चेहरे को लपेटकर रखती है ताकि घर के किसी पुरूष की नज़र न पड़े। उनका बाहर आना -जाना वैसे भी वर्जित ही होता है। बूढ़ी को किसी की नजर का कोई खतरा नहीं रहता । वैसे भी मतवा सिर्फ मेरे ही घर आती थीं और उन्हें इस तरह आना-जाना अन्यथा नहीं लगता था। हाँ, उस समय मैं ये जरूर सोचती थी कि यदि वे ब्लाउज पहनती तो उनका शरीर इस तरह बेडौल और वीभत्स नहीं दिखता।
आखिर यह कैसा रिवाज़ है कि पति के मर जाने पर स्त्री एकवस्त्रा ही रहेगी और अपने फीगर को इस तरह बिगाड़ देगी। मेरा आश्चर्य तब और बढ़ा, जब माँ ने बताया कि उन बड़े घरों में स्त्रियाँ रसोईघर में भी एकवस्त्रा रहती हैं चाहें वह सद्य -प्रसूता ही क्यों न हों? तब मिट्टी के चूल्हे पर ही खाना पकता था और बड़े परिवार के लिए भोजन पकाने में बहुत समय लगता था। नहा-धोकर पूर्ण पवित्रता से चूल्हा जलाना पड़ता था और जब तक घर के सारे पुरूष सदस्यों को भोजन परसकर खिला न दिया जाय, चौका छोड़ने की मनाही थी। भले ही बहू का नन्हा शिशु भूख से बिलबिला ही रहा हो और बहू के स्तनों से दूध टपककर उसकी साड़ी को गीला कर रहा हो। इस कुव्यवस्था पर एक पहेली भी प्रचलित थी--ससुर बेटा कैसे हुआ? पहेली का हल यही था कि बहू के स्तन से दूध टपक कर ससुर के खीर की कटोरी में चला गया था।
यह व्यवस्था उसी विशेष जाति में ही थी कि अन्य जातियों में भी, पता नहीं, पर हाँ, ब्रा पहनना किसी भी स्त्री के लिए अच्छा नहीं माना जाता था। माँ कहती थी कि रंडियां ही ब्रा पहनती हैं होंठ रंगती हैं, बाल कटाती हैं और अन्य तमाम श्रृंगार करके मर्दों को रिझाती हैं। अच्छे घर की बहू-बेटियाँ इन सबसे दूर रहती हैं। हाँ, सधवाएँ जरूर पति के लिए सोलहों श्रृंगार करती हैं। पति के सामने श्रृंगार करके आना ही धर्मसंगत है। सोलहों श्रृंगार में पान खाकर होंठ लाल रखना भी था। माँ भी सुहाग वाले व्रतों जैसे तीज आदि में होंठ रंगती थी। इसके लिए वह नारंगी रंग रखती थी और उसे नारियल तेल में मिलाकर होंठों पर हल्के से रगड़ लेती। वह रंग कई दिनों तक उसके होंठों से नहीं उतरता था।
पर कुमारिकाओं को साज -श्रृंगार से पूरी तरह दूर रहना था। क्रीम -पाउडर, लाली- बिंदी उनके लिए वर्जित था। हाँ, वे अपनी आँखों में घर का बना हुआ काजल लगा सकती थीं। मेरी माँ दीवाली की रात को काजल बनाती थी। इसके लिए सरसों के तेल वाले जलते दीए को एक बड़े से दिए से इस तरह ढंकती कि वह बुझता नहीं था पर बड़े दीए में उसकी कालिमा जमा हो जाती थी। माँ उस कालिमा में देशी घी मिलाकर काजल तैयार करती और कजरौटे में रख देती। अगली दीवाली तक वह काजल चल जाता था। दीवाली की रात जब हम बच्चे सो जाते, जाने कब माँ सबकी आंखों में काजल लगा देती। ऐसा करना शुभ माना जाता था। रात को काजल लगाकर सोने से सुबह मुँह धोने के बाद आंखें बड़ी सुंदर और चमकदार दिखती थीं।
बचपन में सजने की मनाही थी इसलिए होली के दिन कोई रंग लगाए न लगाए मैं चुपके से थोड़ा गुलाबी रंग अपने गालों और होंठों पर मल लेती और शीशे में खुद को देखकर खुश होती। दांत चमकाने के लिए लकड़ी का कोयला या रेत दांतों पर रगड़ना, गोरा दिखने के लिए सुपर रिन से चेहरे को धोना आम बात थी।
आठवीं कक्षा तक माँ द्वारा बांधी जाती अपनी पटिया चोटी पर मेरा ध्यान नहीं गया पर नौवीं कक्षा में लड़कियों को अच्छी तरह बाल बनाकर स्कूल -कॉलेज जाते देख मेरा भी मन उनकी तरह बाल बनाने को हो आया। मैंने माँ से अपनी मंशा बताई तो मां ने बाल खींच -खींचकर खूब पिटाई की साथ ही चेतावनी दी--या तो फैशन या पढ़ाई। दोनों में से एक चुन लो। मैंने पढ़ाई चुनी और इंटरमीडिएट तक हवाई चप्पल, सादे कपड़ों और सादे चेहरे के साथ पढ़ाई करती रही। इसका एक फायदा यह हुआ कि कोई लड़का मेरी तरफ आकृष्ट नहीं हुआ। मेरी छवि एक पढ़ाकू और शरीफ लड़की की बनी रही।
दुबली -पतली होने के कारण कुर्ते के भीतर एक छोटा समीज(बनियाइन) पहनने से मेरा काम चल जाता था पर दीदी स्वस्थ थीं उनके शरीर का विकास भी अच्छा था। वे बेचारी इतनी कसी बनियाइन पहनती कि उनका वक्ष चिपटा हो जाता। अपने उभार उन्हें पाप जैसे लगते, जिसे छिपाने के लिए वे कंधा झुकाकर चलतीं। इसी कारण उनका फीगर थोड़ा बिगड़ भी गया। उस समय ज्यादातर लड़कियों का यही हाल था। वे अपने शरीर के प्रति ही शर्मिंदा थीं। सोने में सुहागा तो माहवारी था, जब तीन-चार दिन उनसे अछूतों जैसा व्यवहार किया जाता था। वे न नहा सकती थीं, न रसोईघर में जा सकती थीं। न अपने बिस्तर पर सो सकती थीं । स्कूल -कॉलेज भी नहीं जाती थीं । अक्सर उन्हें एक चटाई और चादर दे दिया जाता था । वे घर के किसी अंधेरे कोने में पड़ी रहतीं। तीन-चार दिन बाद जब वे नहातीं तो उन्हें चटाई, चादर, घर सब धोना पड़ता। पूजाघर और रसोई में तो पांच-छह दिन बाद ही जाने की इजाजत मिलती थी। सबसे बुरा तो यह था कि उन्हें आजकल की तरह सेनेटरी नेपकिन की जगह पुराने कपड़े इस्तेमाल करने पड़ते थे और वह भी बार -बार उसे धो- सुखाकर। जब पहली बार लड़की रजस्वला होती थी, तो डर के मारे रोने लगती थी कि उसे क्या हुआ है? इस सम्बंध में कोई जानकारी उन्हें नहीं दी गई होती थी। विशेषकर उन घरों में, जहां सिर्फ माँ ही सबसे बड़ी स्त्री सदस्य होती थी। जिस घर में भाभियाँ-मामियाँ होती थीं, वहां की लड़कियों को थोड़ी -बहुत जानकारी पहले से हो जाती थी। उस समय देह और यौन -सम्बन्धी मुद्दों पर बात करने की सख्त मनाही थी इसलिए किशोर होती लड़कियाँ अपने शारीरिक परिवर्तनों के प्रति भयभीत और हीन -भाव से ग्रस्त रहती थीं । दरअसल लड़कियों के लिए वह एक बंद समय और समाज था।
ऐसी छोटी जगह से निकलकर मैं अपेक्षाकृत बड़ी जगह आ तो गई थी, पर भयभीत रहती थी। जिस गर्ल्स हॉस्टल में रहती थी। वहाँ की लड़कियां बड़ी तेज -तर्रार थीं । वे आसानी से मुझे बेवकूफ बना लेती थीं। धीरे -धीरे मैं भी होशियार होने लगी, पर चालाक कभी न बन पाई।
अंजना मुझे अन्य लड़कियों से थोड़ी अलग लगी । उसके बारे में जानने की उत्सुकता भी बढ़ी। उसके बारे में अलग -अलग लोगों से अलग -अलग तरह की जानकारी मुझे मिली। एक जाने -माने पत्रकार और एक पत्रिका के सम्पादक ने मुझे बताया कि वह बहुत ख़तरनाक़ लड़की है। अच्छे -भले आदमियों को बदनाम कर देती है।
-कैसे?
--अरे क्या बताऊँ ?पहले मेरे ऑफिस आती थी। मेरी पत्रिका के लिए रचना देने फिर मुझसे फायदा उठाने की कोशिश करने लगी।
-अच्छा!
--हाँ, ऑफिस के अंडरग्राउंड में मेरा एक कमरा है। जहाँ मैं पढ़ता-लिखता हूँ। अच्छी लाइब्रेरी बना रखी है। वहां कोई नहीं आता । शांति रहती है। ऑफिस में तो लोगों का आना- जाना लगा रहता है। स्टॉफ भी रहते हैं। एक दिन उसने लाइब्रेरी दिखाने को कहा तो मैंने उसे वहीं बुला लिया। थोड़ी देर बाद वह चीखती -चिल्लाती ऑफिस में आई और पूरा हंगामा कर दिया कि मैंने उससे फ़ायदा उठाने की कोशिश की है। मुझे इतनी शर्मिंदगी हुई कि क्या बताएं। आप ही बताइए उसमें स्त्री-जनित कोई आकर्षण है? उस जैसी फटीचर- सी लड़की को मैं छूना भी पसन्द नहीं करूंगा।
ऑफिस स्टॉफ ने उसे डांटकर भगा दिया। बड़ी बेकार लड़की है उससे दूर ही रहिएगा।
गोष्ठयों में आने वाले कवियों में से एक ने बताया कि वह एक प्रेस में काम करने जाती हैं। प्रेस का मालिक बेहद अय्यास किस्म का है। वह लड़कियों का रैकेट चलाता है। उसी में यह भी चलती है पर भाव देखा है लगता है कितनी शरीफ बंदी है। किसी से सीधे मुँह बात भी नहीं करती।
अंजना गम्भीर थी। साधारण शक्ल -सूरत की थी। उसके तेल से चिकटे, गंदे खुले बाल, पुराने फैशन के पैंट - शर्ट को देखकर कोई भी उसे अर्धपागल मान सकता था पर वह दुश्चरित्र नहीं हो सकती, इसका मुझे पूरा विश्वास था। हाँ, उसकी ऐंठ, बेरूखी मुझे भी अच्छी नहीं लगती थी।
उसके विचार भी मुझसे मेल खाते नहीं थे। वह पूजा -पाठ, जादू -टोना आदि में विश्वास रखती थी, साथ ही उसमें उच्च -जाति में जन्म लेने का भी गुमान था। इन सबके बावजूद उसमें कुछ ऐसा था जो मुझे आकृष्ट करता था।
वह कुछ था -उसकी संघर्षशीलता। दुनिया से लड़ -भिड़कर वह अपने रास्ते चली जा रही थी। उस पर अपने छोटे भाई- बहन का दायित्व था। माँ की मृत्यु हो चुकी थी। पिता शराबी और बड़ा भाई आवारा। एक खंडहर होता घर था, जिसे बचाने लिए वह अपने ही बाप -भाई से जूझ रही थी। खुद तो ज्यादा नहीं पढ़ पाई थी पर छोटे भाई -बहन को पढ़ा रही थी। छोटी- मोटी नौकरी उसे मिलती पर जल्द ही छूट जाती। हर जगह उससे अनुचित मांगें रखी जातीं। उसके शोषण का प्रयास किया जाता और उसे भागना पड़ता पर वह भी उन्हें आसानी से नहीं छोड़ती थी। उनकी इज्जत की पाह लगा देती। प्रेस क्लब जाकर सारा भंडाफोड़ कर देती। यही कारण था कि अब कोई भी उसे अपने यहां काम नहीं देता था।
वह किसी से नहीं सटती थी इसलिए कवि- गण भी उससे मन ही मन खार खाए रहते थे। उसको बर्बाद करने के इच्छुक ही पीठ पीछे उसे दुश्चरित्र कहते थे। सामने तो वह उनका मुँह ही नोंच लेती।
कुछ समय बाद मैंने गौर किया कि वह एक शायर के पास ही बैठती है। अपनी रचनाएँ उसी से करेक्ट कराती है। वह शायर भी काफी तेज- तर्रार था और ग़जल विधा में माहिर भी, पर वह चेहरे से ही घाघ नज़र आता था। शादीशुदा और बाल- बच्चेदार था। आयोजनों में वह उसके गार्जियन की तरह उसके साथ रहता। उसी के साथ वह कहीं आती -जाती। दोनों की उम्र में काफी अंतर था । वैसे प्रत्यक्ष में उन दोनों की कोई भी हरकत ऐसी नहीं होती थी कि उनमें अफ़ेयर का संदेह हो, पर छोटे शहरों में किसी लड़की और पुरूष को एक साथ देखकर लोग अच्छी कल्पना नहीं कर पाते।
मुझे बस यही आश्चर्य था कि लहसुन -प्याज तक न खाने वाली यह ब्राह्मण कन्या अधेड़, मांसाहारी, शादी-शुदा, बाल -बच्चेदार मुसमान शायर से दोस्ती करके क्या पाएगी?सिवाय बदनामी के। ऊपर से वह कोई नौकरी नहीं करता, न धनाढ्य ही है कि उसकी कोई आर्थिक मदद ही कर सके।
मैं जब आखिरी बार उन दोनों से मिली थी तो वे कवि-गोष्ठी खत्म होने के बाद भी एक कोने में एक -दूसरे में खोये दिखे थे।
उसके बाद मैं अपने शोध -कार्य में जुट गई.... फिर नौकरी और जिंदगी की अन्य समस्याओं में। छोटी -मोटी गोष्ठियों में आना- जाना बिल्कुल छूट गया। कभी कभी अंजना की याद आती थी कि उसका क्या हुआ?
एक दिन पता चला कि उसने अपना घर बेच दिया है और कहीं चली गई है। कहाँ गई इसका किसी को पता नहीं। कुछ लोग अटकलें लगाते थे कि शायर किसी दूसरे शहर में कोई छोटी -मोटी नौकरी कर रहा है, तो हो सकता है कि वह भी वहीं हो। छोटी बहन की शादी उसने कर दी थी और छोटा भाई अकस्मात चल बसा था।
लगभग पन्द्रह वर्ष बीत गए थे । एक दिन मैंने गूगल प्लस पर एक विज्ञापन देखा जिसमें कुछ औषधियाँ की खूबियां बताई गई थीं और औषधि मंगाने का पता भी था। चेहरा जाना-पहचाना लगा तो मैंने उसका प्रोफ़ाइल देखा। अंजना ही थी पर बिल्कुल बदली हुई। अधेड़, बीमार चेहरा, आंखों के नीचे स्याह घेरे। मैंने उसके फोटोज़ देखे तो उसमें उसके साथ एक बच्चा भी दिखा, जिसका चेहरा हूबहू उस शायर जैसा था। अब संदेह की कोई गुंजाइश नहीं थी।
साइकिल वाली वह तेज -तर्रार लड़की पूरी तरह नष्ट हो गई थी। स्थितियों -परिस्थितियों ने औरतखोरों का शिकार बना डाला था।
****************
अर्चना और संजना पाँचवीं तक नगर पालिका के स्कूल में मेरे साथ ही पढ़ी थीं, पर उनके घरवालों ने छठी कक्षा में उन्हें पढ़ने के लिए ब्वॉय -कॉलेज की अपेक्षा गर्ल्स -कॉलेज में भेजा था। अपने घरवालों के दबाव के कारण वे मुझसे थोड़ी कटी -कटी रहतीं। दोनों एक साथ स्कूल जाती -आतीं। हालांकि दोनों का आपस में और कोई मेल नहीं था। संजना ऊंची जाति की धनी- मानी परिवार से थी जबकि अर्चना पिछड़ी जाति और निम्न आयवर्ग की लड़की थी। अर्चना की माई की गली के मुहाने पर पान की दुकान थी। वह एक बदनाम और झगड़ालू स्त्री थी। मुहल्ले में उसकी नंगई से सभी डरते थे। उसने अपनी इकलौती बेटी की शादी पाँच वर्ष की उम्र में ही कर दी थी पर गौना अभी तक नहीं किया था। अर्चना साधारण शक्ल -सूरत और भरी देह वाली साँवली लड़की थी, पर उसकी छोटी -छोटी आंखों में बड़े -बड़े सपने थे। उसका गला बहुत सुरीला था। अम्मा अक्सर गाना सुनने के लिए उसे बुला लेती। वह अपनी माई से बिल्कुल अलग थी। सभ्य और शांत। बचपन में मैं उसके साथ तमाम तरह के खेल खेलती थी। उसका सबसे पसंदीदा खेल घर -घर था। कभी हम ईंटों और मिट्टी से घर बनाते, कभी बालू के ढेर में पैर फंसाकर। हर बार उसका घर सुंदर बनता। उसका अपना घर फूस और मिट्टी से बना था। वह कहती -पढ़ाई करके नौकरी करूंगी, फिर पक्का घर बनाऊँगी। हम पुतरी -कनिया का ब्याह भी साथ ही रचाते थे। उस समय वह विवाह के सुंदर- सुंदर गीत गाती और उसकी आँखें स्वप्निल हो जातीं। हमेशा कहती कि बड़ी होने के बाद किसी हीरो जैसे लड़के से ब्याह करूँगी।
'पर तुम्हारा ब्याह तो हो चुका है न !'
मैं उसकी सीधी मांग के आगे से शुरू होकर पीछे तक जाने वाले पीले सिंदूर की ओर इशारा करके कहती।
--वो कौन- सी शादी थी! मैंने तो दूल्हे को देखा तक नहीं है। सुना है दूर के किसी पिछड़े गाँव में उसका घर है। घास- फूस का ही। खेती- बारी कराता है। वहाँ औरतें गोबर पाथती हैं, खेतों में काम करती हैं। वहाँ न सिनेमा देखने को मिलेगा, न सलवार समीज पहनने को। मैं तो नहीं जाऊंगी वहाँ....।
मैं सोचती -सही तो कहती है वह, मैं भी तो ऐसी जगह नहीं रह सकती। बाइस्कोप पर होरो- हीरोइन को देखकर वह खुश हो जाती। उन दिनों घर -घर टीवी नहीं होती थी। संजना के घर टीवी थी पर उसकी माँ हमें अपने दरवाजे पर चढ़ने नहीं देती थी। वह खुलेआम हम लोगों को 'नीचजतिया' कहती और खुद को 'बड़ आदमी'। मुझे बहुत गुस्सा आता पर माँ समझा देती कि यही सदियों से चला आ रहा रिवाज है। संजना में अभी यह भेद- भाव नहीं आया था। वह टीवी पर फिल्में देखकर नाच के स्टेप सीखती और फिर हम लोगों को सिखाती। हम तीनों में वह न केवल सबसे सुंदर थी बल्कि अच्छा नृत्य भी करती थी। अर्चना अच्छा गाती थी। मैं पढ़ने में अव्वल थी, पर नृत्य और गाने से भी मेरा बहुत लगाव था। उन दिनों अक्सर हमारे मुहल्ले में परिवार -नियोजन विभाग की तरफ से फिल्में दिखाई जाती थीं। सफेद चादर का पर्दा तानकर प्रोजेक्टर से फिल्में चलाई जाती थीं, जिसका उद्देश्य परिवार -नियोजन के प्रति जनता को जागृत करना था। ज्यादा तो उसमें प्रचार ही होता था, पर लोगों को आकृष्ट करने के लिए फिल्में भी दिखाई जाती थीं । हम तीनों सहेलियां सांस रोके एकटक हीरो -हीरोइनों को नाचते -गाते देखतीं और हीरोइन की जगह खुद के होने की कल्पना करतीं। फ़िल्म देखने के बाद हफ्तों हम हीरोइन के अंदाज में ही बोलतीं, चलतीं, हंसतीं, गातीं और नाचतीं । इसमें सबसे उम्दा नकल संजना करती।
संजना ज्यों- ज्यों बड़ी होती गई उसमें हीरोइन बनने के कीटाणु बढ़ते गए, पर उसका परिवार बहुत ही पुराने विचारों का था। वैसे लड़की को किसी तरह दसवीं पास कराकर उसके हाथ पीले कर देने का चलन तो हमारे घरों में भी था।
हम नवीं कक्षा में पहुंच गईं थीं। मैं लड़कों के कॉलेज में वे दोनों लड़कियों के कॉलेज में।
एक दिन पूरे मोहल्ले में हड़कंप मच गया। अर्चना और संजना स्कूल के लिए निकलीं तो फिर लौटीं ही नहीं । पूरे कस्बे में उन्हें खोजा गया पर उनका पता ही नहीं चला। रात हो गई। संजना के परिवार वाले अर्चना के दरवाजे पर आकर गालियाँ दे रहे थे। उसकी माई को मारने के लिए दौड़ रहे थे, साथ ही आरोप लगा रहे थे कि अर्चना संजना को बहकाकर भगा ले गई है। सुबह हो गई दोनों का कहीं पता न चला। बदनामी के डर से संजना के घर वाले पुलिस में रिपोर्ट भी नहीं लिखा रहे थे। संजना के जूनियर इंजीनियर चाचा, अध्यापक पिता और हिंदी से एम. ए. कर रहा भाई दौड़ -धूप कर रहे थे। एक बार वे मेरे घर की तरफ लपके तो अम्मा दरवाजे पर तनकर खड़ी हो गई--मेरी लड़की लड़कों के कॉलेज में पढ़ती है और संजना का मेरे घर आना -जाना भी नहीं है, इसलिए मेरी बेटी को डराने की जरूरत नहीं।
वे लोग थोड़े शर्मिंदा दिखे और फिर गुस्से में अर्चना की माँ को दो झापड़ रसीद कर दिए--अगर मेरी बेटी नहीं मिली या उसके साथ कुछ भी बुरा हुआ तो तुम्हें जिंदा जमीन में गाड़ देंगे। तुम्हारे घर में आग लगा देंगे। बड़े आदमी की लड़की भगाई है। जरूर तेरी मिली- भगत होगी।
झगड़ालू होते हुए भी अर्चना की माई उनकी दबंगई से दहल गई थी। वह थर थर काँप रही थी । वह तो अपनी बेटी के लिए रो भी नहीं पा रही थी।
दूसरे दिन दुपहरिया को अर्चना अकेली ही घर लौट आई। उसके आने की खबर पाते ही संजना के घर वाले आ गए। पूछताछ से देहखोरों के एक बहुत बड़े गैंग का पता चला, जिन्होंने अर्चना को तो छोड़ दिया था क्योंकि वह सुंदर नहीं थी पर संजना को साथ ले गए थे।
घटना कुछ इस प्रकार घटी थी।
मारवाड़ियों के उस गर्ल्स इंटर कॉलेज में संजना की दोस्ती एक मारवाड़ी लड़की से हो गई थी। वह स्कूल से ही उसके घर चली जाती थी। उस मारवाड़ी लड़की की बड़ी बहन का विवाह मुम्बई के एक अमीर परिवार में हुआ था। लड़की जब ससुराल जाने लगी तो उसके परिवार वालों ने एक दस साल की पहाड़ी लड़की को उसके साथ बतौर नौकरानी भेज दिया था। नौकरानी के माता- पिता बेहद गरीब थे और कुछ दिन पहले ही मेरे मुहल्ले के मुहाने पर किराए का एक कमरा लेकर रहते थे। उनके तीन -चार बच्चे और थे। उनके घर के बाहर सड़क पर एक सरकारी हैडपम्प था, उसी से पानी लेकर वे अपना काम चलाते थे। कोई उनकी नोटिस नहीं लेता था। नौकरानी लड़की आठ- साल बाद अपनी मालकिन के साथ लौटी थी और फिर अपने माता- पिता के पास आ गई थी। मुम्बई के माहौल में रहकर वह पूरी हीरोइन बन गई थी। उसके मुहल्ले में आते ही जैसे हड़कम्प मच गया। उसे देखने के लिए लाइन लग जाती थी। वह थी भी बहुत आकर्षक। गोरी -चिट्टी, घुटने तक लंबे बाल, सुंदर -सुगठित देह। वह कमरे में खाना खाकर अपनी थाली लिए ही नल के पास पानी पीने आ जाती, तो वह भी एक स्टाइल लगती। झूठ नहीं कहूँगी अम्मा की हिदायत के नाते मैं उससे कभी मिली नहीं, पर उधर से आते- जाते मेरी नज़र उसी को ढूँढती। उसके घर के सामने वाली सड़क हमेशा बिजी रहती। वैसे वह बहुत ही कम कमरे से निकलती, पर उसकी एक झलक पाने के लिए जाने कहाँ -कहाँ से मजनू आ जाते थे। लड़की नृत्य- गायन में भी माहिर थी। उसके घर से अक्सर थाल बजाकर फिल्मी गीत गाने की आवाज आती। उसका बाप क्या करता है, उनका खर्च कैसे चलता है, किसी को नहीं मालूम था । वैसे शक्ल -सूरत से वे शरीफ और सीधे ही लगते थे।
अर्चना और संजना पर भी उसका जादू चल गया था। उनके दबे हुए अरमान मचल उठे थे। वे उसके घर आने -जाने लगी थीं। वह उन्हें नृत्य और हाव -भाव सिखाती। पहाड़ी लड़की से दोनों की हीरोइन बनने की ख्वाहिश नहीं छिप सकी। उसने उन्हें हीरोइन बना देने का आश्वासन दिया। उसने बताया कि मुंबई के फ़िल्म डायरेक्टरों से उसकी अच्छी जान -पहचान है। अगले महीने वह भी वापस जाने वाली है। उसे एक फ़िल्म में काम करने का ऑफर आया है। अगर वे दोनों भी तैयार हों, तो वह बात चलाए।
"अंधा क्या मांगे दो आंखें। "
फिर उस एक कमरे वाले पहाड़ी के घर में क्या -क्या हुआ और कैसे -कैसे प्लान बना, कोई नहीं जानता। गुप्त रूप से सारी सेटिंग हो गई थी। एक दिन पहले वह पहाड़ी परिवार किराए का घर छोड़कर गया और दूसरे दिन स्कूल से ही अर्चना और संजना गायब हो गई थीं । अर्चना के पास तो ढंग के कपड़े तक नहीं थे पर संजना जेवर और रूपए भी साथ ले गई थी।
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--तुम लोग कहाँ गए थे और कैसे गए थे, बिस्तार से बताओ
--संजना का चाचा अर्चना को देखते ही चिल्लाया।
''हम लोगों को एक पहाड़ी कार से गोरखपुर ले गया था। वहाँ हमें एक घर में दूसरे पहाड़ी को सौंपकर चला गया। रात भर हम वहीं रहीं। सुबह एक तीसरा पहाड़ी आया उसने मुझसे कहा-तुम हीरोइन नहीं बन सकती। वापस लौट जाओ पर किसी को हमारे बारे में मत बताना। ''
क्लू मिलते ही संजना के चाचा, पिता और भाई ने अर्चना को कार में बिठाया। रोने- गिड़गिड़ाने पर अर्चना की माई को भी साथ ले लिया और उनकी गाड़ी तेजी से गोरखपुर की ओर दौड़ पड़ी। रास्ते- भर मारे दहशत के अर्चना हलकान रही। संजना का भाई उसे घूरता तो उसे लगता उसकी सलवार गीली हो जाएगी। उसे वह वाकया याद आता, जब वह छठी कक्षा में पढ़ती थी । एक दिन वह संजना के घर काँपी माँगने आई तो उसका भाई बरामदे में ही मिल गया। उसने संजना तक पहुंचाने के बहाने एक अंधेरे कोने में उसके सीने को दबोच लिया जबकि अभी उसकी देह में अंकुर भी न फूटे थे। उसने इतनी बेदर्दी से वहां के मांस को कुचला था कि हफ्तों वहां का हिस्सा लाल रहा। दर्द से वह चीखने को हुई तो उसके मुँह को दबाकर बोला --ख़बरदार! जो किसी को बताया, नहीं तो नीचे का हिस्सा भी लाल कर दूँगा।
किसी के आने की आहट पाकर वह छिप गया। संजना की माँ थी । उसे देखते ही आग- बबूला हो गई--का रे छौड़ी, तोर एतना मजाल, नान्ह जात के होके हमरे घर में घुस अइले। अब सगरो घर के साफ कराके गंगा जल छिड़के के परी। जो भाग इहवाँ से.....।
वह भागती हुई अपने झोपड़े में आकर पुआल के बिस्तर पर गिर पड़ी। सीने के ऊपर और भीतर दोनों ओर आग जल रही थी।
''उनके बेटे ने मुझे छुआ उसको किस गंगा जल से धोएँगी?बड़ आदमी !हुँह!"
उसने कई बार उनके पति को हरिजन टोली की तरफ जाते देखा है । वहाँ पूजा करने तो नहीं जाते। सबको पता है कि सलोनी दाई उनको कितनी सलोनी लगती है। और बेटा खेत -खलिहान में काम करने वालियों को दबोचता फिरता है। औरतखोर हैं सब के सब। फिर भी शराफत का ढोल पीटते हैं।
पर इस समय सचमुच स्थिति नाजुक है। उसने बड़ी गलती कर दी कि संजना के साथ गई। संजना ने उसे इस्तेमाल किया। जब पहाड़ी ने उसे रिजेक्ट करके वापस भेजा तो संजना कैसे हँसी थी?
अर्चना की माई भी बड़ी परेशान थी । वह ईश्वर से प्रार्थना कर रही थी कि संजना सही -सलामत मिल जाए वरना उसकी बेटी का सामूहिक बलात्कार निश्चित है। ये दबंग रेप करके उसकी बोटी -बोटी काट डालेंगे और उसको तो उसके झोपड़े में ही फूँक देंगे। उसकी बेटी औरतखोरों के चंगुल में फंस गई है।
गाड़ी तेजी से गोरखपुर की ओर भागी जा रही थी। उसमें बैठे सभी लोग तनाव में थे। अर्चना और उसकी माई को अपने प्राणों का भय था तो संजना के घरवालों को कुल- खानदान की नाक कट जाने की चिंता। जब सड़क के दोनों तरफ इमली के विशालकाय वृक्ष दिखाई देने लगे तो पता चला कि गोरखपुर आ गया। गोरखपुर इतना छोटा शहर भी नहीं है कि आसानी से उस जगह का पता चल जाए, जहां रात -भर दोनों लड़कियां ठहरी थीं। दिमाग पर बहुत जोर देने पर अर्चना को याद आया कि पहाड़ी ने कूड़ाघाट नाम लिया था। वे लोग कूड़ाघाट पहुंचे। वहाँ की कई गलियों में भटकने के बाद अर्चना ने एक गली की ओर इशारा किया कि शायद इसी के भीतर वह घर है। उसे खा जाने वाली नजरों से घूरते संजना के चाचा ने गाड़ी सड़क के किनारे खड़ी कर दी और अर्चना को लेकर गली में घुसे । बाकी लोगों को उन्होंने गाड़ी में ही रहने का आदेश दिया।
पहाड़ी दरवाजे पर ताला लगाकर भागने ही वाला था कि चाचा ने उसे धर दबोचा। अर्चना को देखते ही वह सारा माज़रा समझ गया। वह गिड़गिड़ाने लगा---"साब, हमारा कोई दोष नहीं! लड़की हमारे पास नहीं । उसे दूसरा आदमी ले गया। वह स्टेशन गया है मुंबई जाएगा...लड़की भी मर्जी से उसके साथ है। "
'साले, तेरी माँ की......तेरी खबर बाद में लूँगा। पहले साथ चल के लड़की को बरामद करा.....!'
पहाड़ी को लगभग घसीटते हुए चाचा गाड़ी तक आए और उसे सीट के नीचे डाल दिया और तेजी से रेलवे स्टेशन की तरफ गाड़ी दौड़ा दी। स्टेशन पर उतरते ही उन्होंने अर्चना और उसकी माई के सामने पचास रुपए फेंके और कहा कि सीधी घर चली जाओ। हम वापस आकर वहीं मिलते हैं।
समय नहीं था । उन्होंने जल्दी से मुंबई जाने वाली ट्रेन का पता किया । ट्रेन बस छूटने ही वाली थी। उन्होंने भाई -भतीजे को पहाड़ी को पकड़कर रखने को कहा और ट्रेन की तरफ दौड़ पड़े। ट्रेन ने अभी रफ़्तार पकड़ी ही थी कि वे ट्रेन में चढ़ गए। चलती ट्रेन में ही वे एक डिब्बे से दूसरे डिब्बे में भटकते रहे। संजना अगर इसी ट्रेन से दूसरे दर्जे की आरक्षित टिकट से जा रही है तो मिल ही जाएगी, पर वह कहीं दिख नहीं रही थी। ढूंढ-ढूंढकर वे हलकान हो चुके थे। इसके पहले कि वे निराश होकर वहीं बैठ जाते। उनकी नज़र एक सरदार लड़के पर पड़ी जो एक पहाड़ी के बगल में बैठा हुआ था। वह लड़का उन्हें देखकर काँप रहा था। उन्होंने गौर से लड़के को घूरा तो पहचान लिया, वह संजना ही थी। उन्होंने पहाड़ी को दो झापड़ रसीद किए और ट्रेन की जंजीर खींच दी । ट्रेन रूक गई । उन्होंने संजना से उतरने को कहा तो वह तैयार ही नहीं हुई। वह उन्हें पहचानने से भी इंकार कर रही थी। चाचा ने उसे भी झापड़ रसीद किए तो उसके होश ठिकाने आ गए। तब तक रेलवे पुलिस आ गई थी। चाचा से सारी बात जानकर उन्होंने पहाड़ी को अपने कब्जे में ले लिया और पुलिस जीप में अर्चना और उसके चाचा को बिठाकर गोरखपुर स्टेशन की तरफ चल दिए। ट्रेन मुंबई की तरफ रवाना हो चुकी थी। पुलिस ने दूसरे पहाड़ी को भी गिरफ्तार कर लिया। उन्हें बहुत दिनों से एक ऐसे गैंग की तलाश थी जो गाँव -कस्बों और छोटे शहरों की भोली -भाली लड़कियों को हीरोइन बनाने का सब्जबाग दिखाकर मुंबई ले जाता था और उन्हें देह- व्यापार के दलदल में धकेल देता था। इन दो पहाड़ियों के माध्यम से पूरे गैंग को पकड़ा जा सकेगा-इसलिए पुलिस ने चाचा को धन्यवाद दिया कि उन्होंने अपने साहस और तत्परता से न केवल अपनी भतीजी की इज्जत बचाई बल्कि इतने बड़े गैंग को पकड़वाने में मदद की। संजना के चाचा ने पुलिस से प्रार्थना की कि इन सबमें उनकी बेटी का नाम न उछले, वरना बहुत बदनामी होगी और लड़की का ब्याह हो जाना मुश्किल हो जाएगा।
अर्चना और उसकी माई अपने घर पहुंच चुकी थी। पूरे मोहल्ले के लोग उनसे सवाल पूछ रहे थे, पर संजना के घर वालों के डर से वे चुप थीं। संजना के पिता, चाचा और भाई दूसरे दिन वापस आए पर उनके साथ संजना नहीं थी। वे उसे अपने पुस्तैनी गांव छोड़ आए थे। गांव में किसी को संजना के भागने की खबर नहीं थी।
संजना को कस्बे में फिर किसी ने नहीं देखा। गांव में रहकर ही उसने प्राइवेट छात्रा के रूप में हाईस्कूल की परीक्षा दी और फिर उसकी किसी इज्जतदार घर में शादी कर दी गई और वह इज्जतदार बहू, पत्नी, माँ बनकर 'बड़ आदमी' बनी रही।
पर अर्चना के साथ ऐसा नहीं हुआ! वह निरन्तर बदनामी के दलदल में धंसती चली गई। उसकी ज़िंदगी बर्बाद हो गई।
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अर्चना पर पहली गाज यह गिरी कि स्कूल से उसका नाम काट दिया गया। अब शिक्षा का मार्ग उसके लिए बंद हो गया। दूसरी गाज यह कि मुहल्ले के हर घर ने उसके प्रवेश पर पाबंदी लगा दीं। तीसरी यह कि अब हर ऐरा- गैरा उसकी ओर हाथ बढ़ाने लगा। उसका कहीं आना -जाना, बाहर निकलना मुहाल हो गया। अब वह अकेली पड़ गई थी। मैं उसे अपनी छत से आते -जाते देखती और दुःख से भर जाती। उसकी एक छोटी -सी भूल ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा था। अम्मा को भी उससे सहानुभूति थी पर बाबूजी और मेरे तीनों भाई उसे देखते ही चिढ़ जाते।
उसके घर में हैंडपाइप नहीं था। वह थोड़ी दूर के सरकारी हैंडपाइप के नीचे सिर धुलती थी । बाल्टी में पानी भरकर घर लाती और फिर नहाती। एक दिन दुपहरी में जब सब लोग अपने घरों में सो रहे थे। अर्चना के चीखने -चिल्लाने से सब जाग पड़े। वह मुहल्ले के एक अधेड़ पर इल्जाम लगा रही थी कि जब वह अपना सिर धुल रही थी। उसने उसकी इज्जत पर हाथ डाला था। सबको ये फिल्मी डायलाग लग रहा था।
अम्मा बोली --ऐसा हुआ होगा। वह अधेड़ औरतखोर है।
पर मुहल्ले में अर्चना की बात को कोई गम्भीरता से नहीं ले रहा था। सब उसी को दोष दे रहे थे कि खुले में सिर धोने की जरूरत क्या थी? अधेड़ की बीबी भी उसकी तरफ से लड़ने आ गई कि-- 'सात घाट के पानी पीके सतवंती बनल बाड़ी। अरे पहड़िया छोड़ले होई। गोरखपुर रात बीता के आइल रहली । हमरे मरदे के दोष लगावत बाड़ी, उ त थूकबो ना करिह एपर....। आखिरकार अर्चना की माई उसे पकड़कर घर के भीतर ले गई। अर्चना अभी तक नहीं समझ पा रही थी कि फ़िल्म और जिंदगी बिल्कुल अलग होती है।
एक बार रात को उसकी माई की अनुपस्थिति में एक दूसरा आदमी उसके झोपड़े में घुस गया था। तब भी इसी तरह हंगामा हुआ था। अर्चना की जवान होती देह पर औरतखोरों की नजर पड़ने लगी थी। वह गरीब थी और अब तो बदनाम भी हो गई थी। उसकी माँ उसे पान की दुकान पर बैठने को कहती, तो वह मना कर देती। दूकान पर जाने किस -किस तरह के लोग आते हैं ...घूरते हैं ...मजाक करते हैं । वह उनका टुच्चापन नहीं सह सकती। वह वास्तव में शरीफ लड़की थी पर औरतखोरों की मंशा थी कि वह शराफत छोड़ दे। अर्चना आगे पढ़ना चाहती थी पर उसकी माई ने साफ कह दिया था कि पढ़ने के कारण वह बिगड़ी थी इसलिए आगे पढ़ाई नहीं। अर्चना मुझे कॉलेज जाते देख उदासी से मुस्कुराती। अपनी सखियों के हस्र को देखकर मैंने अपने -आप को पूरी तरह पढ़ाई पर केंद्रित कर दिया था।
अर्चना की माई ने सोचा कि उसका गौना कर देते हैं । ससुराल जाकर वह भी अपनी गृहस्थी बसाए । अब यहां क्या रखा है?बड़े गुप- चुप और सादे तरीके से गौना हुआ!दूल्हा बस अपने पाँच भाई- भतीजों के साथ आया था। अर्चना की तरफ से उसके ननिहाल के ही कुछ रिश्तेदार मात्र थे। मोहल्ले में से किसी को आमन्त्रण नहीं था।
अर्चना ने धोती -कुर्ता पहने, काले और नाटे कद के अनपढ़, देहाती दूल्हे को देखा तो गहरे दुःख में डूब गई। वह पान से होंठ लाल किए, आंखों में मोटा काजल लगाए उसे देखकर मुस्कुरा रहा था। जब उससे गाना गाने को कहा गया तो वह 'हरे रामा हरे कृष्णा'-नामक भजन गाने लगा। इस पर सभी लोग ठहाका लगाने लगे। अर्चना का गुस्सा फट पड़ा । कहाँ तो उसने हीरो जैसे दूल्हे की कल्पना की थी और कहां ये भुच्चड़ देहाती!उसने एलान कर दिया कि वह ससुराल नहीं जाएगी। खेतों में रोपनी- सोहनी करना, उपले पाथना, गाय- भैंस की देखभाल उससे न हो पाएगा। माई ने उसे बहुत समझाया ..मारा-पीटा..घर से निकाल देने की धमकी दी पर वह टस से मस न हुई। उसने खाना -पीना छोड़ दिया। कई दिन तक बेचारा दूल्हा उम्मीद में ससुराल बैठा रहा। उसे आश्वस्त करता रहा कि वहाँ कोई ऐसा काम मत करना, रानी बनाकर रखूँगा पर वह नहीं मानी। अगर मान गई होती तो शायद वह भी संजना की तरह एक सामान्य अंत को प्राप्त करती पर वह सामान्य लड़की नहीं थी। वह सचमुच की हीरोइन थी और बिना हीरो के उसकी जिंदगी अधूरी थी। उसने इस सपने को जीया था। उसके खून के हर कतरे में यह सपना था । धरती पर उसको पैर जमाने की जगह नहीं मिल रही थी पर उसके हाथ आकाश की ओर उठे हुए थे।
एक दिन उसके सपने ने ही उसकी जान ले ली।
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समय तेजी से भागा जा रहा था। अर्चना काफी समय से नहीं दिख रही थी, पता चला कि वह ननिहाल गई है। मैंने दसवीं की परीक्षा पास कर ली थी। अब मेरे लिए भी संघर्ष की स्थिति थी क्योंकि बाबूजी और भाई मेरे आगे पढ़ने के ख़िलाफ़ थे। मेरे लिए वर की तलाश हो रही थी। बस अम्मा ही चाहती थी कि आगे पढूँ। अम्मा को फ़िल्म देखने और लोकप्रिय साहित्य पढ़ने का बहुत शौक था । हालांकि वह खुद पांचवीं पास थी पर हम बच्चों को अक्षर- ज्ञान उसी से मिला था । हिसाब- किताब में भी वह माहिर थी। गुलशन नंदा, रानू, शिवानी के उपन्यास वह दो दिन ही पढ़ डालती। यही कारण था कि वह चाहती थी कि मैं आगे पढूँ। मेरी कविता लिखने की रूचि को बढ़ावा देने का काम उसने ही किया। वह अपने सपनों को मुझसे पूरा करना चाहती थी। विशेषकर अपनी शिक्षा की कमी और उपन्यास की नायिका की तरह आम लड़कियों से अलग-थलग, कुछ विशेष होने का सपना। उसे टीचर और नर्स की नौकरी पसन्द थी। उन दिनों इन्हीं क्षेत्रों में लड़कियों ने काम करना शुरू किया था। यहां वे अन्य नौकरियों की अपेक्षा ज्यादा सुरक्षित मानी जाती थीं।
पर ऐसा नहीं था उस समय भी हर जगह औरतखोरों की उपस्थिति होती थी। लड़कियों को ही अपनी बुद्धि का उपयोग कर उनसे बचना होता था। थोड़ी- सी असावधानी उन्हें दलदल में धकेल देती थी, फिर उससे उबरना मुश्किल होता था। अम्मा मुझे सुरक्षित रहते हुए आगे बढ़ने की कला सीखा रही थी। मैं गुमराह न होऊं, इसके लिए वह मुझे मर्दों की बेवफाई के किस्से सुनाती थी। उन दिनों 'तोता -मैना की कहानी' वाली कोई पत्रिका आती थी, जिसमें एक तोता मैना को बेवफाई की कहानियां सुनाता था। बेवफाई स्त्री पुरूष दोनों ओर की होती थी। अम्मा उसे पढ़ती और मेरी चोटी करते समय उनकी कहानी अपने तरीके से सुनाती यानी सिर्फ पुरुषों की बेवफाई के किस्से सुनाती। इसका परिणाम ये हुआ कि मुझे पुरूष जाति से ही नफरत हो गई। मैं कॉलेज, पास-पड़ोस और रिश्तेदार लड़कों तक से बात नहीं करती थी। हर लड़का या पुरुष मुझे गलत ही नज़र आता। मैं उनके बारे में अच्छा सोच ही नहीं पाती थी। मैं विभक्त हो रही थी। मेरे भीतर कई स्त्रियाँ बन रही थी। एक जो प्रकृति ने मुझे बनाया था, दूसरी वह जो माँ मुझे बनाना चाहती थी, तीसरी वह जो पास -पड़ोस और समाज को देखकर मुझमें बन रही थी, चौथी वह जो मुझे शिक्षा और किताबें बना रही थीं। कब कौन सी स्त्री मुझ पर हावी हो जाएगी, पता नहीं था।
प्रकृति ने मेरे भीतर पुरुष के प्रति आकर्षण पैदा किया था पर बाकी सारी स्थितियां /परिस्थितियां मेरे भीतर उसके प्रति विकर्षण पैदा कर रही थीं।
मैं अम्मा से बहुत घुली -मिली थी। उससे कोई भी बात नहीं छिपाती थी। कॉलेज आते- जाते अगर कोई लड़का मुझे छेड़ देता तो वह भी उसे बता देती। अम्मा इसी कारण मुझ पर बहुत ज्यादा विश्वास करती थी। वैसे मेरे साथ इस तरह की घटनाएं कम ही हुई । इसका पहला कारण तो मेरा सामान्य रूप -रंग और बेहद दुबली -पतली काया थी। हाईस्कूल तक मेरी देह पर यौन- चिह्न दिखाई ही नहीं देते थे। दूसरा कारण कॉलेज से घर तक ही मेरी सीमा-रेखा थी। अम्मा मुझे किसी सखी- सहेली के घर न जाने देती थी, न उनका अपने घर आना ही उसे पसन्द था। वह कहती कि सखी- सहेलियां ही लड़कियों को बिगाड़ती हैं। लड़के लड़कियों को मिलाने के लिए वे बिचौलिए का काम करती हैं। अम्मा मुझ पर कड़ी दृष्टि रखती थी, फिर भी कभी -कभार कोई घटना घट ही जाती थी।
जब मैं सात साल की थी तो पड़ोस के एक लड़के ने मुझे अठन्नी दिखाकर आँख दबाई । मुझे कुछ समझ में नहीं आया, पर अच्छा नहीं लगा। मैंने अम्मा को जाकर यह बात बता दी । थोड़ी देर बाद दोनों की अम्माओं में घमासान छिड़ा हुआ था । नौवीं में मेरे साथ फिर एक घटना हुई थी। मैं किताबों को सीने से चिपकाए पैदल ही कॉलेज की तरफ जा रही थी कि साइकिल सवार एक लड़के ने जोर से मेरे सीने पर हाथ मारा और भाग गया। मेरी किताबें नीचे गिर गईं। मुझे कुछ समझ ही नहीं आया कि उसने मेरी किताबें क्यों गिराई?अम्मा के बताने पर समझ में आया कि उसका उद्देश्य कुछ दूसरा था। मैंने फिर उस लड़के को बहुत बददुआएँ दीं। उसके मर जाने की कामना तक कर डाली।
अम्मा ने तोता- मैना के साथ सतियों की भी कहानियाँ सुनाई थी। उसकी कड़ी हिदायत थी कि लड़की को सिर्फ पति से ही प्रेम करना चाहिए, चाहे वह कोढ़ी, बीमार, अत्याचारी कैसा भी हो?
और विवाह से पहले प्रेम का ख्याल भी पाप है।
मैं अम्मा को हर बात बता देती थी, बस एक बात उससे छिपाई थी कि मेरे सपनों में, मेरी कल्पना में एक राजकुमार था, जो मुझसे सच्चा प्रेम करता था। हालांकि यह प्रेम दैहिक नहीं था, फिर भी उससे विवाह तो हुआ नहीं था, तो अम्मा की नज़र में तो पाप ही था। मुझे विश्वास था कि मेरा राजकुमार ही मेरा पति होगा और वह औरतखोर नहीं होगा।
हालांकि अम्मा के हिसाब से हर मर्द औरतखोर होता है। बस किसी का पता चल जाता है और किसी का नहीं चलता। 'पकड़ा गया सो चोर'!
--"लेकिन अम्मा बाबूजी तो ऐसे नहीं ..राम नहीं थे ...कृष्ण नहीं थे। उपन्यासों और फिल्मों के हीरो ऐसे नहीं होते, फिर तुम कैसे कह सकती हो कि हर मर्द औरतखोर होता है...!"
अब मैं इंटरमीडिएट में थी और अम्मा से तर्क करने लगी थी। अब उसकी हर बात मुझे सही नहीं लगती थी। मेरा विवेक जागृत हो चला था।
--जिसको मौका न मिले, एकांत न मिले, पसंदीदा स्त्री न मिले वह सत्यवान या फिर जिसमें साहस की कमी हो, घर- परिवार, समाज -संसार का लिहाज़ हो या फिर रूप -रंग, धन- दौलत, ताकत -शौर्य की कमी हो या फिर धर्म भीरू हो, वह सत्यवान!एकनिष्ठ, पत्नीव्रती!वैसे सिर्फ पत्नी पर ही आश्रित रहने वाले भी औरतखोर श्रेणी में आ सकते हैं क्योंकि वे अपनी पत्नी को मादा से ज्यादा नहीं समझते। तुम्हारे बाबूजी इतने सीधे -सच्चे हैं न !मुझसे प्रेम भी बहुत करते हैं पर एक दिन उनकी देह की जरूरत को नकार दूं। अस्वस्थता के कारण या बच्चों की माँ के साथ सोने की जिद के कारण उनके कमरे में न सोऊँ तो दूसरे दिन सुबह से ही खाना -खर्चा बंद। बच्चों की जिम्मेदारी तक नहीं उठाते। मुँह सूज जाता है। बातचीत बंद कर देते हैं। यह सिर्फ मेरी ही बात नहीं, हर औरत की यही दास्तान है। पति की इच्छापूर्ति से इनकार करते ही औरत को उसकी औकात दिखा दी जाती है। मर्द देह पाकर ही खुश होता है। अपने प्रेम को भी देह के माध्यम से ही प्रकट करता है!किसी मर्द की पत्नी मर जाती है तो वह दूसरे विवाह में देरी नहीं करता है। भले ही वह घर- गृहस्थी, बच्चों या अकेलेपन की दुहाई दे, पर वास्तव में उसे स्त्री -देह की ही आकांक्षा होती है ....तो फिर वह औरतखोर हुआ कि नहीं ।
माँ के इस प्रवचन से मेरे कोमल हृदय को चोट लगी। मैंने स्पष्ट कह दिया कि--मैं शादी नहीं करूँगी अम्मा। किसी औरतखोर को खुद पर हावी नहीं होने दूँगी। खूब पढूंगी ....नौकरी करूंगी। तुम्हें अपने पास रखूंगी।
अम्मा हँसने लगी ---औरतखोर का पता देखकर थोड़े हो पाता है। फिर हर लड़की को शादी करनी होती है और सब कुछ सहना होता है। यही उसकी नियति है और यही परम्परा है।
--मैं नहीं मानती इस नियति और परम्परा को!लड़की अपना भाग्य खुद निर्मित कर सकती है। अपना पति, भर्ता, कन्त खुद बन सकती है।
अम्मा ने आश्चर्य से मुझे देखा । उसकी समझ में कुछ नहीं आया था। मैंने उसे समझाया--देखो अम्मा, पति का अर्थ 'रक्षक' होता है पर वह स्त्री का भक्षक बन जाता है। पति को भर्ता भी कहते हैं यानी भरण- पोषण करने वाला। स्त्री आत्मनिर्भर बनकर अपना भरण पोषण भी कर लेगी और अपनी रक्षा भी। पति कन्त(प्यारा)भी कहलाता है पर कितनी स्त्री को मनपसंद कन्त मिलता है। शादी के लिए तो जाति -धर्म, कुल -गोत्र जाने क्या-क्या देखा जाता है!दोनों के खानदानों के स्तर के मेल पर जितना ध्यान दिया जाता है, उतना लड़के लड़की के मेल पर नहीं। दोनों की कद- काठी, रूप -रंग, विचार- भावना, रूचि -अरुचि, पसन्द नापसन्द पर ध्यान देने के बजाय धन- दौलत, पद -कद उपहार -दहेज पर ध्यान दिया जाता है। इसी कारण अक्सर शादियां बेमेल होती हैं और दम्पति में वह प्रेम नहीं पनप पाता, जो गृहस्थ का आधार होता है।
---बाप रे !बहुत ज्ञान हो गया है तुमको। इतने ज्ञान के साथ सामान्य जीवन नहीं जी पाओगी!
अम्मा चिंतित हो उठी। तभी पड़ोस की एक औरत तेजी से मेरे घर में घुसी। उसने बताया कि अर्चना ननिहाल में किसी मुसलमान लड़के से फंस गई थी और उसने उसके साथ भागकर शादी कर ली है।
मैंने लम्बी साँस ली -ओह, तो वह फिर किसी औरतखोर के जाल में फंस गई।
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अर्चना को अपने ननिहाल के गांव में आकर बहुत सुकून मिला था। खेतों में लहलहाती फसलें, बाग- बगीचों की फलदार हरियाली, शुद्ध हवा ने उसका मन मोह लिया। यहां के ग्रामीण लोगों से उसे भरपूर प्यार मिल रहा था। वह पिछले दिनों के तनाव को भूल चुकी थी। उसका चेहरा निखर आया था। तेजी से शहर में तबदील होते अपने कस्बे की संक्रमण कालीन मानसिकता से वह ऊब गयी थी। दोहरे लोग, दोहरा चरित्र, छी:!
वह गाँव की लड़कियों के साथ खेतों की पगडंडियों पर फिसलती, मटर की फलियां तोड़कर घर लाती और उनकी घुघनी बनवाकर खाती। बाग में पेड़ों पर चढ़कर आम- अमरूद तोड़ती और बड़े चाव से खाती। गाय और बकरी दूहती। उसे इन सब कामों में बहुत मजा आता। उसका बचपन फिर से लौट आया था। गांव भर में वह अकेले घूम आती। यहां कोई ख़तरा नहीं था और न ही रोक -टोक थी। उससे मामी -नानी कोई काम भी नहीं कराती थीं। आखिर वह चार दिन की पाहुन थी।
एक दिन वह एक पेड़ पर अटक गई । चढ़ने को तो चढ़ गई थी, पर उतर नहीं पा रही थी। ऊपर से कूदने पर चोट लगने का खतरा था। तभी उसने देखा कि दो जोड़ी खूबसूरत आंखें उसे निहार रही हैं। 'हीरो ' --उसके दिल से आवाज़ उठी। ऊंची कद -काठी, इकहरे बदन, सुंदर चेहरे वाला मनमोहक हीरो....इस पिछड़े गांव में! पहरावे से शहरी लग रहा है। बाल करीने से सेट, होंठों पर मुस्कुराहट!
उसका दिल जैसे उसमें ही अटक गया।
दोनों एक -दूसरे को निहारे जा रहे थे।
---मैं मदद करूं उतरने में..!. हीरो ने अपना हाथ बढ़ाया। अर्चना का सिर अपने आप 'हाँ 'में हिल गया। नीचे उतरने के बाद वे दोनों देर तक पेड़ की छाया में बैठकर बातें करते रहे। परिचय का आदान- प्रदान हुआ । हीरो ने बताया कि वह बगल के मुस्लिम गांव के दर्जी मुमताज खान का बेटा है और बारहवीं पास कर पास के ही शहर में एक कारखाने में काम करता है। ईद मनाने आज ही घर आया है। अभी कुछ दिन यहीं रहेगा। इस गाँव में किसी से काम था। लौटते वक्त उसे पेड़ में अटके देखा तो रूक गया था।
दोनों खुलकर हँस पड़े। अर्चना को याद नहीं कि कितने अरसे बाद वह हँसी है। अर्चना ने भी उसे अपने बारे में सब कुछ बता दिया सिर्फ अपने भागने और हीरोइन बनने के सपने के बारे नें नहीं बताया।
--फिर मिलोगी न । दोनों गांवों के बीच एक नदी है उसी के किनारे मिलें।
अर्चना हीरो की कोई बात नहीं टाल सकती थी। रात-भर वह करवट बदलती रही और सुबह होते ही नदी की तरफ चल दी। वहाँ हीरो पहले से ही मौजूद था। फिर वे रोज मिलने लगे। एक दिन अर्चना की नानी के पड़ोसी ने दोनों को एक साथ देख लिया। नानी को ये बात पता चली तो उन्होंने अर्चना को बहुत डांटा--'मुसलमान के साथ घूमती हो। धर्म -कर्म का भी विचार नहीं । हम हिन्दू लोग उनका छुआ खाते -पीते तक नहीं। वैसे भी गद्दार जाति होती है और तुम उन्हीं से दोस्ती करी हो। आज के बाद उससे नहीं मिलना। '
अर्चना ने सिर झुका लिया।
अर्चना जन्मजात हीरोइन थी । वह जाति- धर्म, ऊँच -नीच का विचार नहीं करती थी। उसके लिए प्रेम ही एकमात्र सच था, जो पहली ही नजर में हीरो से हो चुका था। वह उसके साथ जीवन बीताने के सपने देखने लगी थी, पर उसे यह भी पता था कि परिवार, समाज और धर्म से इसकी इज़ाजत नहीं मिलेगी।
इसलिए जब हीरो ने उसे अपने साथ शहर चलने को कहा तो वह तुरत मान गई।
हीरो ने अपने किराए के घर में उसे बड़े प्रेम से रखा। उसकी जरूरत की हर वस्तु लाकर दी। वह उससे निकाह करना चाहता था पर अर्चना ने कहा कि वह अपना धर्म नहीं बदलेगी, पर धर्म उनके प्रेम के बीच में भी नहीं आएगा। वे बिना विवाह के ही साथ रहेंगे। कुछ महीने बड़े ही प्रेम से गुजरे । अर्चना गर्भवती हो गई। अब उसे चिंता होने लगी कि उसकी सन्तान का धर्म क्या होगा? उसे निकाह करके मुसलमान हो जाना चाहिए पर अब हीरो निकाह से कतरा रहा था। इधर उसमें एक तबदीली और नजर आ रही थी कि वह बार -बार अपने गांव जा रहा था।
एक दिन अर्चना को पता चला कि गांव में उसकी बीबी- बच्चे हैं। उस दिन दोनों ने पहली बार लड़ाई हुई।
--तुमने मुझे धोखा दिया। पहले क्यों नहीं बताया कि तुम शादीशुदा हो?
'मौका ही कहाँ मिला?'
--तुम एक साथ दो औरत कैसे रख सकते हो?
'रखने को तो चार भी रख सकता हूँ। हमारा धर्म इसकी इजाज़त देता है। '
--तुमने प्रेम के नाम पर छल किया।
'नहीं, यह सरासर इल्ज़ाम है। तुम मुझे अच्छी लगी थी, इसलिए तुम्हें अपनाया। छल करना होता तो एक बार हासिल करने के बाद ही छोड़ देता। तुम गुस्सा न करो। बच्चे पर बुरा असर होगा। '
फिर तो अक्सर दोनों के बीच लड़ाई होने लगी। अर्चना अपने को बुरी तरह फंसा पा रही थी। अब वह कहीं भी लौटकर नहीं जा सकती थी। हीरो भी उसे छोड़कर जा सकता था, फिर वह बच्चे को लेकर कहाँ भटकेगी? उफ, उसने अपनी जिंदगी के साथ क्या -क्या कर लिया! वह जाने किस मृगतृष्णा में भटकती रही है। वह कहाँ जाए ?क्या करे? किसी को मुंह दिखाने के काबिल भी तो नहीं बची है।
इधर अर्चना की माई परेशान थी। बेटी के मुसलमान के साथ भागने की खबर पर उसने माथा पीट लिया था पर कस्बे में किसी को यह बात नहीं पता थी। एक दिन उसने यह हवा फैला दी कि उसने अर्चना की शादी शहर में कर दी है और वह अपने ससुराल में बहुत खुश है। वह यहां आना ही नहीं चाहती।
माँ अपनी संतान के कुकर्मों पर पर्दा डालने के लिए क्या कुछ नहीं करती, पर सच सारे परदे को भेदकर प्रकट हो ही जाता है।
अर्चना को बेटी हुई है--यह खबर पाकर माई उसको देखने के लिए छटपटाने लगी। किसी तरह वह उस शहर पहुंची और फिर उस घर में, जहाँ अर्चना रहती थी।
पर ये क्या, अर्चना की जगह उसे एक जली हुई अधमरी औरत मिली, जिसकी बगल में एक बच्ची बिलख रही थी। बगल की एक कुर्सी पर सिर पर हाथ रखे हीरो बैठा था। जाने किस तरह और किस तरह की आग से वह इतनी बुरी तरह जल गई थी। चेहरे के अलावा पूरा शरीर झुलसा हुआ था। लगता था कि दो -तीन पहले ही वह जली है पर अस्पताल की जगह घर पर ही उसकी मरहम- पट्टी की गई है। वह मरणासन्न थी और किसी उम्मीद में दरवाजे की तरफ टकटकी लगाए हुए थी। माई को देखते ही उसकी आँखों में एक चमक उभरी। उसने माई की तरफ दुःख से देखा फिर बच्ची की तरफ और उसकी आंखें पथरा गईं। माई चीख पड़ी। हीरो भी बिलख रहा था और बच्ची रोये जा रही थी। माई ने बच्ची को सीने से लगा लिया। बच्ची चुप हो गई। माई ने हिकारत से हीरो को देखा। उसने माई के पैर पकड़ लिए। वह डर गया था कि माई उसे पुलिस के हवाले न कर दे पर माई ने ऐसा कुछ नहीं किया। वह
बच्ची को लेकर कस्बे लौट आई । सबको यही बताया कि चेचक के कारण अर्चना मर गई। अब वही इस नन्हीं अर्चना को पालेगी।
आखिर अर्चना की दुःखद कथा का अंत भी दुःखद ही हुआ। उसका हीरो भी तो औरतखोर ही निकला था।
अर्चना के अंत ने मेरे विचार को पुष्ट किया कि मुझे पढ़-लिखकर आत्मनिर्भर बनना है !एक व्यक्ति बनना है। शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, सामाजिक हर दृष्टि से एक स्वावलम्बी व्यक्ति स्त्री। उसके पहले न प्रेम, न विवाह, न सहजीवन, न अंतरंग मित्रता। वही पुरुष मेरे जीवन में आएगा जो मुझे औरत नहीं अपनी तरह एक व्यक्ति मानेगा। अपने समान स्तर का व्यक्ति। तभी वह औरतखोर नहीं बनेगा और न मैं सिर्फ औरत!
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मैं आज तक नहीं समझ पाई कि जो औरतखोर होते हैं, उनकी अपनी बहन -बेटियों के प्रति कैसी दृष्टि होती है?हमारे समय में तो बहन- बेटियाँ बाप -भाइयों से दूर ही रहती थीं। किशोर उम्र के बाद उनके सामने पर्दे की हद तक ढकी -मुंदी बिना सिंगार -पटार के ही आती थीं। उनके बीच एक गरिमामय दूरी हमेशा बनी रहती थी, पर आज स्थिति बदल चुकी है । आधुनिकता ने पुरानी सारी बंदिशें हटा दी हैं । अब तो जवान -जहान बहन -बेटियां भी बाप -भाइयों के पीठ पर चढ़ी रहती हैं। छोटे फैशनेबल ड्रेस पहने उनके साथ बाहर आती- जाती हैं। एक- दूसरे को गले लगाना, फ्रेंडली बात करना आम बात हो गई है। हालांकि हाई सोसाइटी और उच्च -मध्यवर्ग में ही यह परिवर्तन ज्यादा है बाकी में कम, पर परिवर्तन तो हुआ है और यह बहुत बुरा भी नहीं है। पर क्या ये परिवर्तन सिर्फ रहन -सहन, वेश- भूषा, बात -व्यवहार तक ही सीमित है ?कि सामंती मानसिकता भी बदली है?विचार के स्तर पर भी आधुनिकता आई है?आधुनिकता का अर्थ नई सोच...!नयी सोच में स्त्री भी व्यक्ति है। पुरूष के समान है। उसे पुरूषों के हर क्षेत्र में काम करने का अधिकार है। अपनी मर्जी के अनुसार जीने का अधिकार है।
अगर हाँ, तो फिर आए दिन छोटी -छोटी बच्चियों से लेकर बूढ़ी स्त्रियों तक से रेप क्यों हो रहे हैं? वे कौन लोग हैं, जो ऐसा कर रहे हैं? ऐसा भी नहीं कि सारे रेपिस्ट गरीब, पिछड़े, अपढ़, जाहिल और मशीनी जीवन जीने वाले ही हैं उसमें मंत्री से सन्तरी, उच्च शिक्षित से अंगूठा छाप, अफसर से मजदूर, मालिक से मजदूर, बूढ़े से किशोर, हर क्षेत्र - प्रांत, राज्य-देश, धर्म-सम्प्रदाय, सन्यासी-गृहस्थ, साधू -असाधू सब शामिल हैं । क्या वे आधुनिक नहीं हुए? क्या उनके लिए स्त्री आज भी सिर्फ मादा है जिसे बहला- फुसलाकर, प्रेम का नाटक करके या जबरन हासिल किया जा सकता है?
मेरा सवाल ऐसे लोगों के लिए ही है, जिनके लिए दूसरी स्त्री सिर्फ मादा है, तो वे अपने घर की स्त्रियों को किस दृष्टि से देखते हैं? क्या वे उनके लिए प्राचीन समय की तरह सिर्फ सम्मान और प्रतिष्ठा की वस्तु हैं ?हाँ, वस्तु कह रही हूँ--जिसकी अपनी कोई मर्जी नहीं होती । वह शिक्षा, नौकरी, विवाह अपनी मर्जी से नहीं कर सकती और प्रेम तो उसके लिए अक्षम्य अपराध है, जिसकी सज़ा सिर्फ मौत है सिर्फ मौत!पर पुरुष के लिए नहीं वे चाहें कितनी भी शादियां करें, रखैलें रखें, वेश्याओं के पास जाएं या रेप करें, उनके इस कृत्य से उनकी और उनके खानदान की प्रतिष्ठा नहीं जाती। यह तो उनकी गौरव -गाथा होती है।
क्या आधुनिकता ने इस दोहरी मानसिकता का अंत किया है?क्या इस मानसिकता का अंत नहीं होना चाहिए?
मुझे याद आती है कुसुम। ठाकुर घराने की सांवले रंग, बड़ी बड़ी आंखों वाली, ऊंचे कद की लम्बी -चौड़ी, स्वाभिमानी कुसुम। वह मुझसे कई साल छोटी थी। मेरे ही कॉलेज में नौवीं में पढ़ती थी पर कभी मेरा अभिवादन नहीं करती थी। उसके चेहरे पर बड़े घर, बड़ी जाति की लड़की होने का रुआब था। उसके दादा पहले किसी गांव के जमींदार थे। जमींदारी खत्म होने पर कस्बे में ही हवेली जैसा घर बनवाकर रहते थे। अम्मा बताती थी कि बहुत ही अय्याश किस्म आदमी था बुड्ढा। गाँव में रहा तो वहाँ की बहन -बेटियां सुरक्षित नहीं थीं, यहां भी इसी जुगाड़ में रहता है पर यह गांव नहीं है। सभी आज़ाद हैं। अस्सी साल का बूढ़ा बाघ है । शिकार आसानी से मिल जाए तो चीर- फाड़ खाए। उसका भरा -पूरा परिवार है। दो बेटा और एक बेटी है। सबकी शादी हो गई है।
उसी अय्याश बूढ़े के बड़े बेटे की बेटी थी कुसुम। बड़े ही लाड़ -प्यार से पली थी।
उसके बाल लड़कों की तरह कटे थे। वह ज्यादातर पैंट-शर्ट पहनती थी। कॉलेज में सलवार -कमीज -दुपट्टा पहनती थी।
समय बदला था। अब लड़कियों का लड़कों के कॉलेज में पढ़ना बुरा नहीं माना जाता था। लड़कियां अब क्रीम -पाउडर लगाकर स्कूल -कॉलेज जाने लगी थीं। अमीर घरों की बड़ी लड़कियां अब ब्रा भी पहनती थीं। शादीशुदा लिपिस्टिक भी लगा लेती थीं। कस्बे में कई ब्यूटी पार्लर खुल गए थे। परिवर्तन तो अम्मा में भी आया था। अब वह छोटी बहनों को पाउडर लगाने से मना नहीं करती थी, पर मुझ पर अभी तक पुरानी पाबंदी का असर था। मैंने कभी अपने भौंहों की थ्रेडिंग नहीं कराई थी। एक दिन मेरी कॉलेज की सहेलियाँ जबर्दस्ती मुझे एक पार्लर में ले गईं और थ्रेडिंग करा दीं। मुझे बहुत दर्द हुआ, पर जैसे मेरा चेहरा ही बदल गया। उस दिन घर पर मैं अम्मा से बचती फिर रही थी, पर उसकी नज़र पड़ गई । फिर तो मेरी वो लानत -मलामत हुई कि तौबा!अम्मा ने साफ इल्ज़ाम लगाया कि मेरे घर को बिगाड़ने की शुरूवात इसी ने की है। आज भौंह बनवाई है कल बाल कटवाएगी। बड़े घर की लड़कियों की नकल कर रही है।
बुरा यह हुआ कि दूसरे ही दिन छोटी बहन अपने बाल कटाकर आ गई । अम्मा ने उसे कुछ नहीं कहा, मुझे ही कोसा कि बड़ी बहन का ही अनुकरण छोटी बहनें करती हैं। मेरे मन में आया कि कहूँ कि फिर मेरी अच्छी बातों का अनुकरण बहनें क्यों नहीं करतीं?किसी का भी मेरी तरह पढ़ाई- लिखाई में मन क्यों नहीं लगता?क्यों वे मेरी तरह गीता, रामायण और साहित्यिक किताबें नहीं पढ़ती?
पर अम्मा को जवाब देने, उसकी बात काटने का साहस मुझमें कभी नहीं रहा। मैं अम्मा के डांटने पर अपनी ही गलती मान लेती थी। इसमें मेरा सबसे बड़ा स्वार्थ ये था कि अम्मा के सपोर्ट से ही मैं पढ़ पा रही थी। वर्ना परिवार में सब मेरी पढ़ाई से चिढ़ते थे।
कुसुम मुझे अच्छी लगती थी। कितनी बोल्ड है ...बिंदास है। उसके घरवाले कितना केयर करते हैं उसका। लगता ही नहीं कि वह लड़की है। एक मेरा घर है कि हर कदम पर यह याद दिलाया जाता है कि लड़की हो ..लड़की की तरह रहो। अपनी शिक्षा का अधिकार भी मैं भीख की तरह पा रही थी। अम्मा हर दिन यह अहसान जताती थी कि वह मुझे पढ़ा रही है और
घर की परंपरा के अनुसार नौवीं में मेरा विवाह नहीं किया है। मेरी बाकी बहनें नौवीं में ही ससुराल गईं और वहां से लौटकर किसी तरह हाईस्कूल की परीक्षा दे पाई। फिर उन्होंने पढ़ाई से तौबा कर ली । दरअसल वे खुद भी पढ़ाई नहीं करना चाहती थीं, पर मैं तो खूब.. खूब पढ़ना चाहती थी। हमेशा अव्वल भी आती थी। मेरी फीस माफ हो जाती थी। वजीफ़ा, पुरस्कार से मैंने घर की एकमात्र आलमारी भर दी थी, फिर भी घर में मेरी कोई इज्जत नहीं थी। अम्मा कहती कि उन्हें खुशी तब होती जब भाई अव्वल आता या पुरस्कार जीतकर लाता। मैं आहत हो जाती पर फिर यह सोचकर संतोष करती कि अम्मा जिस परम्परा में पली है, उससे थोड़ी तो आगे बढ़ी है। जिस किसी तरह मुझे पढ़ा तो रही ही है। बाबूजी तो मुझे कब का किसी ऐरे -गैरे के साथ बांध चुके होते। वे मेरे दुश्मन नहीं थे कि ऐसा करते, पर उन दिनों भी बिना दहेज अच्छा लड़का मिलता कहाँ था? घर में पैसे की किल्लत हमेशा रहती थी। बहनें बहुत ज्यादा सुंदर थीं, इसलिए लड़के कम दहेज में ही उन्हें ब्याह ले गए। लड़के भी कोई नौकरीपेशा या अफसर ग्रेड के तो थे नहीं, बनिया -बक्काल ही थे। शिक्षा, सभ्यता- संस्कृति से उनको कुछ लेना- देना नहीं था । बस अच्छा कमाते थे और शानो-शौकत से रहते थे। धन ने सारी कमियों पर पर्दा डाल रखा था। बहनें भी गहने, कपड़े, घर- गृहस्थी, पति-बच्चे में मगन हो गई। उनकी मंजिल भी वही थी पर मैं तो बिगड़ी हुई लड़की थी! जो उच्च शिक्षा, नौकरी और स्वावलम्बन के सपने देख रही थी। मेरा कोई अच्छा बैक ग्राउंड नहीं था, गॉड फादर नहीं था, पैसा नहीं था पर अम्मा थी, सपने थे, लगन था और परिश्रम मैं ख़ूब कर रही थी, तभी तो हाईस्कूल वाले घर में बी .ए. तक पहुंच गई थी ।
कुसुम के घर वाले अमीर और आधुनिक विचारधारा के थे, तभी तो उन दिनों भी उनके घर की बेटी मॉर्डन कपड़े पहनती थी। उसके बॉब हेयर थे और कार से कॉलेज आती -जाती थी। उसके हवेलीनुमा घर में सबसे पीछे उसका अपना कमरा था, जिसके दो दरवाजे थे । एक दरवाजा आगे की तरफ खुलता था दूसरा पीछे की तरफ। पिछले दरवाजे से कभी- कभार ही कोई आता या जाता था। उसकी पढ़ाई में कोई विघ्न न पड़े, इसलिए उसके कमरे में बहुत जरूरत होने पर ही कोई प्रवेश करता था। कुल मिलाकर कुसुम को वह सारी सुख -सुविधाएं, आजादी और परिवार का विश्वास हासिल था, जिसकी मैं कल्पना भी नहीं कर सकती थी।
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आजादी का दुरूपयोग भी होता है। आजकल ही देखिए माँ -बाप अपने बच्चों को अपने खर्च में काट -कटौती करके महंगे मोबाइल दिलाते हैं ताकि उनकी पढ़ाई सुचारू रूप से चलती रहे। पर बच्चे मोबाइल का उपयोग पढ़ाई में कम दोस्त बनाने, दोस्तों से चैट करने, सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने से लेकर पोर्न साइट्स देखने में ज्यादा करते हैं।
कुसुम को पढ़ाने के लिए एक ट्यूटर रखा गया था, जिससे वह अपने कमरे के एकांत में पढ़ती थी। ट्यूटर देखा -भाला और शादीशुदा था, इसलिए विश्वसनीय था।
पर अम्मा कहती थी कि जैसे घास और दियासलाई आस- पास रखने से कभी न कभी उसमें आग लग ही जाती है। उसी तरह किसी भी उम्र के स्त्री पुरूष एकान्त में बहुत पास रहें तो उनमें रिश्ता पनप ही जाता है। कुसुम एक दिन रूपए -जेवर लेकर चंपत हो गई। किसके साथ गई, यह पता नहीं चला क्योंकि मास्टर अपने घर में अपनी पत्नी और बेटे के साथ मौजूद पाया गया।
बहुत तलाश हुई पर रिजल्ट शून्य ही रहा। धीरे- धीरे एक वर्ष होने को आया पर कुसुम को मानो धरती खा गई या आकाश निगल गया। कुसुम के दादा सदमे में बीमार पड़े और चल बसे। अम्मा कहती कि इसी बुड्ढे की पाप की सजा परिवार को मिली है। इस बुढापे में भी आस -पास की गरीब घरों की छोटी बच्चियों को बुलाकर अपने कमर की मालिश के बहाने जाने क्या -क्या कुकर्म करता था। जवानी में तो कुकर्म किए ही थे। जो दूसरों की बहू -बेटियों की इज़्ज़त खराब करता है, ईश्वर उसको जरूर सज़ा देते हैं पर औरतखोर इस बात को नहीं समझते या समझना नहीं चाहते।
एक दिन कलकत्ता में ठाकुर साहब के किसी रिश्तेदार ने कुसुम को देखा। वह एक दोमंजिले मकान के बारजे पर खड़ी थी । उसकी मांग नें सिंदूर था। उसके केश अब कांधे तक बढ़ गए थे। वह खुश दिख रही थी। रिश्तेदार ने आनन -फानन में कुसुम के पिता को खबर दी और तीसरे ही दिन कुसुम मास्टर के साथ धर ली गई।
कुसुम और मास्टर को ठाकुर साहब ने समझाया कि अब तो तुम लोग शादी कर ही चुके हो। घर वापस चलो । हम सब तुम लोगों को स्वीकार कर लेंगे। कुसुम तैयार हो गई, वैसे भी साल- भर में अभाव झेलते -झेलते वह परेशान हो चुकी थी। वह राजकुमारी की तरह सुख- सुविधाओं में पली थी पर मास्टर तो गरीब था। माध्यमिक स्कूल के मास्टर का वेतन ही कितना होता है। उस पर अपनी पत्नी व बच्चे की भी जिम्मेदारी थी। जाने कैसे उसे मास्टर से प्यार हो गया? उसने दिमाग से नहीं दिल से काम लिया था। अपने घरवालों की इज्जत -प्रतिष्ठा भी दाँव पर लगा दी।
पर करती भी क्या, वे लोग इस रिश्ते को स्वीकार ही नहीं करते और उसे हर हाल में मास्टर ही चाहिए था। किन्हीं कमजोर क्षणों में वह अपना तन -मन उसे समर्पित कर चुकी थी । जीवन में एक ही बार प्यार होता है और एक ही बार शादी--यही उसने सुना था। मास्टर भी उसे जी -जान से प्यार करता था । हालांकि उसकी शादी उसके घरवालों की मर्ज़ी से बहुत पहले ही हो चुकी थी, पर पत्नी उसकी जिम्मेदारी थी प्यार नहीं। कुसुम को एकांत में पढ़ाते -पढ़ाते कब उसके मन में प्रेम का बीजारोपण हो गया, वह नहीं जानता। वह उसे बहुत अच्छी लगती थी, पर वह उसे पाने की कल्पना भी नहीं कर सकता था। वह धरती पर था और वह चन्द्रमा थी। वह जानता था कि कुसुम के घरवाले उसकी चाहत के बारे में जान जाएंगे तो उसकी बोटी -बोटी काट देंगे। उसके घरवालों को भी सज़ा देंगे, पर इन सारे खतरे के बावजूद वह दिल के हाथों मजबूर हो गया। कुसुम भी उसे प्रोत्साहित कर रही थी और फिर एक दिन उससे भूल हो ही गई।
उस दिन घर में सिर्फ़ कुसुम थी, जब वह उसे पढ़ाने आया था। कुसुम अभी -अभी नहाकर आई थी। ताजा गुलाब -सी खिली और सुबासित। वह उसे देखता रह गया था। गुलाबी टी शर्ट और काले पैंट में वह कयामत ढा रही थी। वह दुपट्टा नहीं लगाती थी। टी शर्ट के ऊपर उभरे उसके सुडौल वक्ष आज उसे कसमसाते लगे। उसके भीगे होंठ आमंत्रित करते लगे। वह खुद पर काबू नहीं रख पाया और आगे बढ़कर उन होंठों पर अपने होंठ रख दिए। कुसुम भी शायद यही चाहती थी। उसने कोई प्रतिरोध नहीं किया। और ...फिर....वह घटित हो गया...जो धर्म... समाज ..नैतिकता किसी भी दृष्टि से उचित नहीं था, पर वे दोनों खुश थे ....फिर तो यह क्रम चल निकला। अब वे दोनों रात -दिन साथ रहना चाहते थे । चोरी- छिपे का रिश्ता उन्हें तड़पा रहा था । आख़िर भागने की योजना बनी, जिसमें मास्टर के एक मित्र ने मदद की। मास्टर जानता था कि कुसुम के घर वालों का छापा सर्वप्रथम उसके ही घर पड़ेगा, इसलिए वह अपने घर में मौजूद रहा। मामला शांत होने पर वह कोलकाता गया, जहाँ कुसुम उसका इंतजार कर रही थी। वह उसके मित्र के साथ वहाँ गई थी।
ठाकुर साहब ने जब पिता का पुराना स्नेह दिखाया, तो कुसुम पिघल गई और उनके साथ चलने को तैयार हो गई, जबकि मास्टर सब कुछ समझ रहा था । वह कुसुम को इशारे से मना करना चाहता था, पर ठाकुर साहब इतने चौकन्ने थे कि एक पल के लिए भी दोनों को एकांत का अवसर नहीं दे रहे थे।
रात के अंधेरे में कुसुम अपने घर लौटी थी। उसे घर छोड़कर ठाकुर साहब मास्टर को उसके घर पहुंचाने के लिए लेकर चले और फिर सुबह लौटे। मास्टर को वे कहां ले गए, उसका क्या हुआ?पता नहीं चला। उसका परिवार भी रातों -रात लापता हो गया।
कुसुम घर लौट आई है-इसका पता तो हम सबको था, पर वह न तो कॉलेज जाती थी, न बाहर निकलती थी। एक दिन पता चला कि वह मर गई। उसके पेट में भयंकर दर्द हुआ और फिर वह नहीं रही। उसकी बड़ी -बड़ी बोलती आंखें सदा के लिए चुप हो गईं। सुन -गुन था कि वह गर्भवती थी और एबॉर्शन के लिए तैयार नहीं थी। जबरदस्ती गर्भपात कराने के लिए उसे किसी दवा का हाइडोज दिया गया, जिसको उसकी नाजुक देह संभाल न सकी और वह तड़प -तड़प कर मर गई। ऑनर -कीलिंग की यह पहली घटना मेरे बहुत नजदीक घटी थी।
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कुसुम वाले हादसे के बाद मैं पढ़ने के लिए शहर आ गई। मेरा कस्बा पीछे छूट गया। और पीछे छूट गईं वे कहानियां, जो जिंदा सच थीं, जिनका मेरे व्यक्तित्व और शख्शियत पर गहरा असर पड़ा था।
शहर आकर मैंने सोचा कि मैं कुए से समुद्र में आ गई हूं। यहाँ की औरतें न कस्बे की औरतों की तरह शोषित हैं, न पुरुष औरतखोर। मैं सब कुछ भूलकर पढ़ाई में लग गई।
अपनी शिक्षा पूरी कर, स्वावलम्बन प्राप्त किया । फिर मैंने सोचा कि अब तो मैं एक व्यक्ति मान ली गई हूं। पढ़ा -लिखा, सभ्य- सुसंस्कृत समाज मुझे औरत होने के नाते नहीं, व्यक्ति होने के नाते जानता है। मैं फूले नहीं समाती थी कि मेरा अपना एक घर है... एक साहित्यिक संस्था है, नौकरी है, नाम है, पहचान है। अपनी रोटी खुद अर्जित करती हूँ...। अब मैं प्रेम कर सकती हूँ। समान स्तर का प्रेम!
अब कोई मेरा शोषण नहीं कर सकता है। मेरी देह को मेरी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ कोई छू नहीं सकता ।
पर जल्द ही मेरा भ्रम टूट गया । मेरा अभिमान चकनाचूर हो गया। मैंने देखा शिक्षा- जगत हो या साहित्य- जगत हर स्थान पर सभ्य -सुसंस्कृत औरतखोर भरे पड़े हैं। उनके लिए कोई भी औरत पहले औरत है फिर और कुछ। आजाद और अकेली औरत को तो वे सर्वसुलभ मानकर चलते हैं। किसी भी औरत को आगे बढ़ने के लिए उनसे होकर गुजरना पड़ता है। हर बड़े और निर्णायक पद पर वही बैठे हैं। बिना उनके राजी हुए औरत आगे नहीं बढ़ सकती। पुरस्कार /सम्मान नहीं पा सकती...अपनी कोई भी महत्वाकांक्षा पूरी नहीं कर सकती।
इतना ही नहीं औरत न प्रेम कर सकती है न प्रेम पा सकती है।
क्योंकि समान स्तर का न होने के कारण स्त्री- पुरूष में प्रेम मुमकिन नहीं हो पाता।
प्रेम जिंदगी को जिंदगी और समाज को सुंदर बनाने वाला महत्वपूर्ण सामाजिक मूल्य है। इसके लिए दो व्यक्तियों की दरकार होती है। एक स्त्री और एक पुरुष, पर जिस समाज में स्त्री पूरी तरह एक व्यक्ति नहीं मानी जाती, वहाँ वह किस तरह किसी पुरूष से प्रेम कर सकती है? क्योंकि पुरूष तो हर हाल में व्यक्ति होता है ।
यदि पुरूष हैसियत में स्त्री से अधिक होता है तो स्त्री उसके सामने आधा, पौना या चौथाई हो जाती है और पुरूष सवा, डेढ़ या पौने दो। जहाँ ऐसा नहीं है वहां भी पुरूष ही उच्च होता है क्योंकि पुरूष होना अपने आप में एक 'पद' है।
आखिर मैंने अपना रास्ता तय कर लिया। मैंने इसलिए इतना संघर्ष नहीं किया था कि मात्र एक औरत बन कर रह जाऊँ। औरतखोरों का शिकार होकर कुछ पाने से बेहतर था कुछ न पाना।
और यही हुआ विश्वविद्यालय में होने की जगह स्कूल में रहना पड़ा। नामी -गिरामी लेखिका की जगह सामान्य लेखिका ही बनी रही। न प्रेम मिला न गृहस्थी बसी। मैं अकेली ही हर हालात से जूझती रही, पर हार नहीं मानी और ना ही किसी औरतखोर की शिकार बनी। मैं खुश थी कि औरतखोरों से भरे समाज में औरत होने की गरिमा को बचा सकी।
