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Jhilmil Sitara

Children Stories

4  

Jhilmil Sitara

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अनोखा परिवार

अनोखा परिवार

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एक समय की बात है। जंगल के पास से होकर एक नदी गुजरती थी। उसी के किनारे पर रहते थे दादा कछुआ। बर्षों पहले झरने से गिरकर अपने परिवार से अलग हो चुके दादा कछुआ का अब यही ठिकाना था। हालांकि वो अकेले ही रहते थे। जंगल‌ के अन्य जानवरों से अलग - थलग ।


  कुछ समय बाद !


जंगल में बहुत तेज आंधी और तुफ़ान आया भारी बरसात के साथ। पशु पक्षियों में जान बचाकर भागने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। हर तरफ कोलाहल‌ था, बड़े - बड़े वृक्षों की टहनियां टूटकर यहां - वहां गिर रही थी जिनके नीचे आकर जन्तु घायल हो रहे थे। तेज बरसात ने नदी का किनारा तोड़ दिया और बगैर रास्ते के रास्ता बनाती हुई आगे बढ़ने लगी। नदी में किनारे रहने वाले कछुआ दादा भी साथ में बहने लगे और बहकर जंगल के बीचो बीच पहुंच गये। तेज बहाव के होते हुए उन्होंने एक पेड़ की छाल को नाव की तरह उपयोग करते हुए आगे बहते जा रहे थे। कुछ दूर पर उन्हें एक घोंसले को बहते हुए देखा। उसमें चिड़िया तो नहीं थी मगर उसके दो अंडे सुरक्षित थे घोंसले में। दादा कछुआ ने उस घोंसले को सावधानी पूर्वक पेड़ की छाल के अन्दर रख लिया। और पानी से भीगते अंडों को पत्तों से ढंक दिया। पानी का बहाव धीरे - धीरे कम होने लगा था और बरसात आज दो दिनों के बाद थमने लगी थी। मगर, यह हरा - भरा जंगल लगभग तहस - नहस और विरान हो गया था। 


   दादा कछुआ ने पेड़ की छाल को सुरक्षित एक साफ - सुधरे स्थान तक पहुंचाया और राहत की सांस ली। दर असल छाल के भीतर देखते - देखते काफ़ी अंडे जमा हो गये थे जिनका पता दादा कछुआ को भी नहीं था की ये किन पक्षियों के अंडे हैं। कुछ को कीचड़ से निकाला था फंसा हुआ घोंसला देखकर तो कुछ पेड़ों के जड़ों के पास पड़े हुए मिले थे।‌ इस तरह सभी को दादा कछुआ ने बचाकर यहां तक पहुंचाया था। अब वो उस छाल से हटाकर अंडों को ऐसी जगह रखना चाहते थे जहां धूप और‌ गरमाहट का पूरा इंतजाम हो जिससे अंडों से पक्षी बाहर आसानी से निकल पाएं। क्योंकि, अपने अंडों पर बैठने वाले पक्षी शायद अब इस दुनिया में नहीं थे। 


दादा कछुआ ने जमीन से थोड़ी ऊंचाई पर मिट्टी को समतल कर चारों तरफ़ से घेरा बनाया और छाल को बहुत मुश्किल से धकेल कर ऊपर पहुंचाया थोड़ा - थोड़ा रास्ता बनाते हुए। थोड़ी - थोड़ी सूखी घास जमा किया और दो अंडों के हिसाब से घोंसले बनाकर चारों तरफ़ रख दिए और सूखे पत्तों को इकट्ठा कर ढंक दिया सभी को। पेड़ की छाल को पतली लकड़ियों से ढंका और उसके नीचे बैठकर अंडों की निगरानी करने लगे। 


कुछ दिनों बाद पहला अंड़ा फूटने लगा और दादा कछुआ उत्सुकतावश अंडे के पास गए। आंखों में खुशी की चमक थी। मगर जैसे ही पूरा अंड़ा फूटा कछुआ दादा अपने मोटे कवच में छुप गए डर के मारे उनका दिल भी जोर - जोर से धड़कने लगा था। क्योंकि, उस अंडे के अन्दर से एक सांप का बच्चा निकला था। वह किंग कोबरा का बच्चा था। वह सांप का बच्चा अपनी खोल में छुपे कछुआ दादा के चारों र चक्कर लगा रहा था। खोल के अन्दर छुपे हुए कछुआ दादा ने अनुमान लगाया की यह बाकी अंडों को नुकसान पहुंचा सकता है इसे समझना होना यह उसका परिवार है और वह इन सबका रक्षक है बड़ा भाई जैसा है।


अपने कठोर कवच के चारो तरफ़ कछुआ दादा को सरसराहट महसूस हो रही थी। वह छोटा सांप उनके चक्कर लगा रहा था। कवच के ऊपर चढ़कर वह बैठ गया। कछुआ दादा ने समझ लिया अभी उस छोटे सांप ने बाकी सहेजकर रखे अंडों को नहीं देखा है। सही समय था उसे समझाने का। कछुआ दादा ने घबराहट को काबू कर अपनी आवाज़ को गंभीर बनाकर बोला " सुनो बच्चे ! मैं कछुआ दादा बोल रहा हूँ। छोटा सांप इधर - उधर देखने लगा। आवाज़ फिर से आई, सुनो बच्चे यह तुम्हारा घर है और यहां रहने वाले सभी तुम्हारा परिवार हैं। तुम इनके बड़े भाई हो और बड़ों का फर्ज़ होता है अपने से छोटों का ख्याल रखना और उनकी रक्षा करना। अपने सामर्थ्य जितना उनकी जरूरतों को पूरी करना। हमेशा उनके आगे चलना सही राहं दिखाना। तुम्हारे भी यही कर्तव्य हैं यह अच्छी तरह समझ लो और इसका पालन करना ही तुम्हारा धर्म है। अगर तुमने मेरी बातों का पालन नहीं किया तो मैं तुम्हें यहां से बाहर निकाल दूंगा।। 

छोटा सांप जो अबतक घूम घूमकर कुछ सुन रहा था और कुछ अनसुना कर रहा था निकाले जाने की बात सुनकर ठहर गया और दादा कछुआ के नज़दीक जाकर बोला " मैं बड़ा भाई हूँ कछुआ दादा तो मैं सबका ख्याल रखूंगा किसी को नुकसान नहीं पहुंचाऊंगा सच बोल रहा हूँ मैं। यह सुनकर तसल्ली होने पर कछुआ दादा ने बाहर अपनी गर्दन निकाली और चमकते हुए काले छोटे सांप को देखा वह मुस्कुरा रहा था। कछुआ दादा ने फिर धीरे - धीरे चलकर बाकी अंडे दिखाए और सबका ध्यान रखने का वादा लिया। 


  समय बीतने लगा और बाकी अंडों से भी बच्चे बाहर निकले। कुछ तो पक्षियों के थे और कुछ मेंढक और कुछ सांप के और अलग प्रजाति के थे । इस तरह एक पूरा परिवार कछुआ दादा की देखरेख में बनकर तैयार हो गया। जहां सभी भाई बंधू बनकर रहने लगे। और जब भी किसी दुर्घटना के बाद कोई अंडा या बच्चा लावारिस मिलता वो उसे अपने परिवार में शामिल कर लेते और परिवार का हिस्सा बनकर साथ रहते। 



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