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तुम्हे खुद ही रचना है अपना इतिहास

तुम्हे खुद ही रचना है अपना इतिहास

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कस कर भींच लो गुलाबी मुट्ठी में

ख़्वाब कोई आसमानी

 

नाप लो तुम अपने छोटे पंखों से

धरा और नीले टुकड़े की दूरी

 

सुनो तलवों में जो चुभन-जलन है न

उसे मिटने-बुझने न देना

 

कंधे पर रखे किसी हाथ से

न हो जाना तुम आश्वासित

तुम्हें खुद ही बनना है अपना आश्वासन

 

देखो आँचल में बंधी गाँठ में तुम करुणा प्रेम संवेदना के साथ

रख लेना कुछ बीज आत्मसम्मान और निष्ठा के

ताकि बनी रहे भीतर की अग्नि में ताप

 

किसी की स्वीकृति पर नहीं निर्भर है तुम्हारा जीवन

ना किसी की अस्वीकृति पर तुम्हारा अंत

 

कि तुम्हें खुद ही रचना है अपना इतिहास

 

 


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