सुनहरा बचपन
सुनहरा बचपन
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न लेना था, न देना था,
अपनी मस्ती में मस्त रहना था,
वह मेरा बचपन था।
निःस्वार्थ, निडर और निःसंदेह था,
न चिंता थी, न मतलब था,
वह मेरा बचपन था।
न रास्ता था, न मंज़िल थी,
न समय कम था, न बात ज्यादा थी,
वह मेरा बचपन था।
न पैसे थे, न गाड़ी-बंगले थे,
मेरी एक छोटी सी साईकिल थी,
वह मेरा बचपन था।
न मोबाईल थे, न घड़ियाँ थी,
फिर भी, सही पते पर सब दोस्त मिलते थे,
वह मेरा बचपन था।
न भविष्य की चिंता थी, न वर्तमान का ठिकाना था,
जो चल रहा था, उसमे सब राज़ी थे,
वह मेरा बचपन था।
वह जैसा भी था, बड़ा अच्छा था,
वह मेरा बचपन था,
वह मेरा बचपन था ।
