सपनों में उलझकर
सपनों में उलझकर
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सपनों में उलझकर
कहीं खो जाते है हम
पर हकीकत में आकर
फिर से रो पड़ते हैं हम ।।
जिंदगी वह नहीं जो हमने कभी,
किताबों में पढ़ा था या कहानी में सुना था ।।
जिंदगी तो वह है जो कभी हमने सपनों में भी नहीं सोचा था।।
बचपन कट जाते हैं यूं ही खेल खेलते खेलते ,
बड़े हो जाते हैं यूं ही देखते देखते,
अब सोचा करते हैं हम..
क्यों हो गए हम इतने जल्दी बड़े..
तो वहीं छोटे में ही रह जाते।
तो कुछ तो अच्छा होता।।
छोड़ भी यह सब कुछ न सही
वह वक्त ही थोड़ी देर और रुक जाता।
तो शायद हमको आज सपनों में उलझना न पड़ता।।
