समर्पण
समर्पण
1 min
398
हवा बनके तेरे सांस में घुल रही हूं
मैं तुझमे थोड़ा थोड़ा पिघल रही हूं
मेरी अदा तो कबकी छूट गई मुझसे
अब तेरे लहजे में सबको मिल रही हूं
तेरी गोद में उछलती नदी सी बहती
अब शांत शीतल जल में बदल रही हूं
बुरा कहा लगता है अब किसी बात का
मैं तेरी यादों में खुदसे संभल रही हूं
मत तराशो कहीं और वजूद अपना
तेरे लफ्ज़ बनके कागज़ पर खिल रही हूं
तू जरा सा थम सा गया है ‘ स्वेत ’ मैं
मैं बनके गजल सदा तुझ मे चल रही हूं।
