शहर
शहर
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आज क्या हुआ इस शहर को
आज यहां पर सब बिखरे बिखरे से क्यूँ हैं
सब एक दूसरे के साथ हो कर भी
यूं दूर दूर से क्यूँ हैं
अब इस शहर में कोई चाहता नहीं है
एक दूसरे भलाई
यहां तो करते रहते है लोग
रोज एक दूसरे की बुराई
कहाँ गए वो दिन जब लोग इश्क के
नाम पर जान दे दिया करते थे...
आज कल तो लोग लव जिहाद के
नाम पर एक दूसरे की जान ले
लिया करते है।
कहां खो गए वो दिन जब घर में कोई
पूजा होती थी तो हम अपने दूर के
रिश्तेदार को भी बुलाया करते थे..
आज कल तो लोग सियासत के नाम पर
लोग अपने खून के रिश्ते को भी
पहचानने से इनकार करते हैं ...।
