शाम की तरह हम ढलते जा रहे हैं
शाम की तरह हम ढलते जा रहे हैं
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शाम की तरह हम ढलते जा रहे है,
बिना किसी मंजिल के चलते जा रहे है।
लम्हे जो सम्हाल के रखे थे जीने के लिये ,
वो खर्च किये बिना ही पिघलते जा रहे है।
धुएं की तरह बिखर गयी जिन्दगी मेरी हवाओं में,
बचे हुये लम्हे सिगरेट की तरह जलते जा रहे है।
जो मिल गया उसी का हाथ थाम लिया,
हम कपड़ों की तरह हमसफर बदलते जा रहे है।
