सामंजस्य
सामंजस्य
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पिताजी चाय नहीं पीते
कहते हैं चाय पीना सही नहीं
परंतु कभी कभी देखा है मैंने
उन्हें पीते ज़हर
समक्ष मेरे
अक्सर नहीं
पर कभी कभी
वो देर शाम
लौटते हैं जब काम से
पर लौटते नहीं है काम से
बैठ जाते हैं कुछ पल
एक टूटी कुर्सी पर
जो है पुस्तैनी
फिर मांगते हैं चाय
परंतु नहीं पीते है चाय
शायद पीते हैं ज़हर
फिर कहते हैं
चाय पीना सही नहीं
मैं देखता हूं
बैठे हुए
पर मैंने महसूस किया
वो नहीं है
बैठे हुए
सोचते रहते हैं
मेरे बारे में
परिवार के बारे में
पर नहीं अपने बारे में
और सोचते सोचते
पीते हैं कुछ घूंटे चाय की
साथ कुछ घूंटे
सामंजस्य की
जो दिखती है
साफ साफ
उनकी नजरों में
कभी कभी आव भाव में
शायद नहीं
पर सुनिश्चित तौर पर
रहते हैं जब अभाव में।
