STORYMIRROR

Gantantra Ojaswi

Others

3  

Gantantra Ojaswi

Others

रे विचित्र परिवेश !

रे विचित्र परिवेश !

1 min
28.1K


रे विचित्र परिवेश!
तज मानवता, धर दानवता
छोड़ स्वयं का वेश!

संस्कार सब हुए पुरातन
आज्ञाकारक मृदु संभाषण
गायब सब परिवार निमन्त्रण
कहीं नहीं अब वे आमन्त्रण।
देखो बढा स्व-देश!

अठखेली के खेल पुराने
पोसम्पा, न ईचक दाने
अक्कड़ बक्कड़ लुकाछिपी में
विष-अमृत के बोल सुहाने…
प्यारा था वह वेश!

पगडंडी के डंडे तोड़े
कुछ बे-लाज शरम के छोड़े
पोर पुखरिया में पत्थर से
कितने उछले ऊंचे रोड़े
कहीं न छल का लेश!

आज समर्पण कितना बाकी
मन से निष्ठुर तन से बाकी
छल दंभी औ अहंकार ने
जाने कितनी सीमा नाकी*
सिमटा सब परिवेश!

* लांघना


Rate this content
Log in