पहला ख़त
पहला ख़त
मोहब्बत - ए- उल्फत में
जज्बों की रोशनी में
अहसासों की स्याही से
लिखा था जो पहला खत
लेकिन एक बाज के डर से
उड़ कर कोई कबूतर
तुम्हारी मुंडेर पर जा न पाया
और मैं भी दुनिया में
तुम्हारी बदनामी के डर से
खुद अपने हाथों से दे न सका
आज भी वह खत
यादों की डायरी में
आहें भरता पड़ा है
और मेरी नाकाम
अधूरी मोहब्बत का
मोहताज खड़ा है
कुछ अक्षर मटमैले हो गये
और कुछ अक्षर तो पीले है
कुछ आंसुओं से भीगें भिंगे
आज तलक भी गीले हैं
तुम नहीं पास मेरे
पर खुशबू अब भी है श्वासों में
पहला लिखा वह खत-ए-मोहब्बत
बाकी है इतिहासों में
