पदमावती
पदमावती
1 min
179
थी उथल पुथल ऐसा था वक़्त
पवित्रता से सशक्त रक्त
वो दामिनी, गज गामिनी
वो राजपुतानी स्वामिनी
पावक परीक्षा की घड़ी
वो पतिव्रता आगे बढ़ी
थी अग्नि की ओर अग्रसर
देखे कुटुम्ब आह भर
उन स्वर्णिम लपटों को याद कर
जब लिए थे फेरे गठबंधन बांधकर
उसी अग्नि को मुक्ति मान कर
पत्नी धरम अपना जान कर
तेज से तेजस्विनी मिली
उसके स्पर्श से अग्नि खिली
अब था उसका श्रृंगार वही
वो बनी सीता, वो हुई सती।
