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Shaheer Rafi

Others

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Shaheer Rafi

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पागल

पागल

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किससे बात करूँ,

कौन सुनेगा ?

जा - जा दिमाग़ मत खा,

हर कोई यही कहेगा ।


रिंद-ए-मस्त हो गया हूँ,

मीज़ान बिगड़ा हुआ है मेरा ।

पेशानी पर गुनाहगार लिखा है,

ईमान बिगड़ा हुआ है मेरा ।


महज़ एक दोस्त की चाहत है,

मगर कौन समझेगा ?

जा - जा पगला कहीं का,

हर कोई यही कहेगा ।


क़स्र-ए-तसव्वुर में बस दो लोग रहते हैं,

मैं और मेरी परछाई ।

न अमलाक, न शक़्ल, न अक़्ल, न शुजाअत,

कुछ भी तो नहीं है मेरे पास ।

अगर मैं ऐसा ही पैदा हुआ हूँ,

तो कुसूर क्या है मेरा ?


निल बटे सन्नाटा है, ज़िन्दगी,

फूल का चोगा बस ख़्वाब है मेरे लिए ।

बस एक बूढ़ी अम्मा है,

जिसका ज़िगर बेताब है मेरे लिए ।


कोई तो होगा ?

जो मेरे पागलपन को समझेगा ।

कोई तो इस दिल-ए-ना-तवां,

को पढ़ेगा ।

कोई तो इस बेकार का दोस्त बनेगा ।


इन मसरूफ़ लोगों में, 

क्या है कोई फ़ुर्सत वाला ।

क्या अब मिलेगा मुझको,

दोस्त कोई मोहब्बत वाला ।


नज़रन्दाज़ी के तरकश का तीर खाया है मैंने,

और ' पाग़ल ' होने का दाग़ पाया है मैंने ।



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