STORYMIRROR

Zahiruddin Sahil

Others

3  

Zahiruddin Sahil

Others

मुस्तक़बिल

मुस्तक़बिल

1 min
392


मजबूर बुढ़ापा

आज भी गलियों में धूल फांकता है


अब भी

कोई मासूम

किसी होटल पे गाली खाता है


अच्छा है के

हम

तरक्की के गीत गाते रहें


मगर....


कुछ फ़टी जेबों से

हिंदुस्तान का

मुस्तक़बिल झाँकता है !!!!!


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन