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सामंत कुमार झा 'साहित्य'

Others

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सामंत कुमार झा 'साहित्य'

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मै अकेला ही काफी हूँ

मै अकेला ही काफी हूँ

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मैं अकेला ही काफी हूँ जमाने के लिए,

मैं खुद ही बहुत हूँ तुम्हें हराने के लिए।।

हमको जीतना तो है ही चाहे कुछ हो,

हमारा एक खिलाड़ी बहुत है जीताने

के लिए।।


समझदार को इशारा ही काफी होता है

कोई भी बात उसे ठीक से समझाने

के लिए।।

बस थोड़ा सा ड़राना ही बहुत था मेरा,

उसे अपने रास्ते से पूरा हटाने के लिए।।

अगर जो नौका को डूबना ही होता है,

एक छेद बहुत है नौका डूबाने के लिए।।

                     


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