माँ की गोद छलनी पाता हूं
माँ की गोद छलनी पाता हूं
माँ तेरी गोद मे सब कुछ भूल जाता हूँ
जब भी सोता सब गम भूल जाता हूँ,
तेरी ममता लगती है मुझे वृक्ष की छाँव
जब भी बैठता हूँ दर्द को भूल जाता हूँ,
सब मंदिरों में धोखा देने में तो नही जाता हूँ
में तो माँ को ही सब देवो की जननी पाता हूँ,
दर्द चाहे कोई भी हो दर्द होने पर
मुंह से मेरे तो माँ ही निकलता है
सब दर्द की दवा माँ तुझको ही पाता हूँ,
लेकिन आज का परिवेश
खा गया है माँ का वेश
घर घर मे माँ को रोते हुए पाता हूँ,
माँ का दिल तो फूलों सा नाज़ुक है
लेकिन अब घर घर मे मां तेरी गोद को
अपने ही बेटों के शूलों छलनी पाता हूँ।
