लुकाछुपी
लुकाछुपी
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आसमानी रंगत
उतर आयी थी,
मेरे अक्स में भी
धूमिल सा अंतर्मन हुआ,
जैसे उगते सूरज में
घुलने चली थी,
धुंध में से छानकर
रौशनी लेने लगी थी,
लुका छुपी खेलता रहा
मुझसे आफताब,
ज़िन्दगी की शाम
कहीं ढलने लगी,
घूँट घूँट उतारकर फिर
सोचा था रोक लूँ
इस ढलती शाम को
सूरज की आह निकली तो थी,
मेरी मीठी सी चिकोटी पर,
देखकर चाँद मुस्कुराया था,
धवल चांदनी छिटकने लगी,
खूबसूरत था आसमान में नज़ारा
लुकाछुपी चाँद सूरज की
अक्स में जैसे उतरकर
एक बार फिर सुबह होने लगी.
