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AMAN SINHA

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AMAN SINHA

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कोरोना का डर

कोरोना का डर

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सुबह निंद से जागा तो मैं काँप उठा 

सर्दी कड़क की थी पर मेरे तन से भांप उठा 

एक जकड़न सी थी पूरे बदन में मेरे 

हाथ ऊपर जो उठाया तो बदन जाग उठा 

 

पहले कभी मुझे ऐसा लगा ही नहीं 

मर्ज़ हल्का ही रहा कभी बढ़ा ही नहीं

लगा ये रोग मुझे कैसे क्या बताऊँ मैं 

कभी बदनाम उन गलियों में मैं गया ही नहीं 


थोड़ी सर्दी थी लगी और ये तन तपता था 

ज़रा बदन भी मेरा आज जैसे दुखता था 

सर दबाया मैंने खूब मगर फर्क पड़ा ही नहीं 

एक ऐंठन सी लगी और गला सूखता था 

 

गया मैं दौड़कर गोली के लिए दवाखाने में 

सुबह से पाँच दफा होकर आया मैं पैखाने में 

आँख कुछ यूं जल रही की कुछ दिखे कैसे 

जंग सा लग गया हो जैसे बदन के कारखाने में 


हुआ कुछ यूं की हाल क्या हम कहे तुमसे 

अब मिलना ना हो पायेगा यार मेरा तुमसे

जाने किस रोग की मैं गिरफ्त आया हूँ 

बच गये तो कहेंगे हर हाल फिर सनम तुमसे 


कल खाया था दाल मैंने गली के नुक्कड़ का 

जरा कच्चा ही रह गया भात प्रेशर कूकर का 

अंदर जो भी गया वो हज़म हो ना सका 

कर गया मुझे बदहाल खाना नुक्कड़ का

 

गया मैं हस्पताल और संग थे यार मेरे 

उठाकर चलने को थे श्मशान तैयार मुझे 

लगा ये उनको के ये आखिरी दिन है मेरा 

कर लिया इंतजाम सबने जनाजे का मेरे

 

उन्हें लग रहा था जैसे मुझे कोरोना है 

अब तो व्यर्थ ही सब ये रोना धोना है

डाक्टर ने कहा डर की कोई बात नहीं 

ये ठीक है इसे हुआ नहीं कोरोना है 

 


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