क़िल्लत
क़िल्लत
1 min
253
चिलचिलाती धूप का गर्म पहरा
तपती जेठ का सूखा सन्नाटा
क्षितिज की तेज़ झनझनाहट
मस्तिष्क भ्रम की सारी उलझने
पानी की असंख्य क़िल्लते
गली शहरों में रोज़ झगड़े
पशु पक्षि सारे त्रस्त पुकारें
वन्य सृष्टि मुर्छित बन बैठी
नदी पोखर दूर दूर तक बंजर पड़े
भूमि व्यथित होकर रोती रही
बादल कब मेघ मल्हार बन के आए!
