खुद का वजूद
खुद का वजूद
1 min
451
ज्यों ज्यों उम्र ढलती जा रही है
जीने की चाहत मिटती जा रही है
नजर नहीं आता अब खुद का वजूद
परछाईं भी साथ छोड़ती जा रही है
न तन देता साथ ,न जीवन में उमंग
न दिल को भाता संगीत ,न कोई तरंग
न जाने मेरी जिंदगी ,क्या चाह रही है
जान अकेली और उलझनें बेशुमार
सुलझते नहीं अब मुझसे उलझनों के तार
ये उलझनें मुझे और उलझा रही है
किसे सुनाएं अपनी दास्ताँ और दिल का हाल
ये दिल अब रहने लगा है बहुत बीमार
अब तो कोई दवा या दुआ भी काम नहीं आ रही है.
