जिंदगी और मैं
जिंदगी और मैं
आदत थी खुली किताब बनने की,
शहर में मज़ाक बन गये
तब लोगों को मजा आया!
ख्वाहिशें थीं सच का दामन ना छोड़ने की,
पर लोगों ने वही सुना जो सुनना था
तो गुस्सा आया!
सोचा था किसी कि जिंदगी बनेंगे हम,
पर उसका ख़्वाब बन के रह गये
तब दिल बहुत रोया!
सोचा था मंज़िल तक जाएंगे अपनी,
राह भटक गये तब जोश खोया!
आदत थी सबको खुद सा समझने की,
जब धोखा खाया तब जिंदगी समझ आया!
कलम उठानी पड़ी जब दर्दे बयां को,
जब दुनिया में कोई नहीं है अपना
समझ आया!
किसी ने खूब कहा है पहले से ना सोचों,
जब खुद को खुद की नजर लग गयी
तब होश आया!
