जीवन ही सतरंगी होली
जीवन ही सतरंगी होली
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होली के सतरंगी
रंगों में आठवाँ रंग
बड़े चाव से सजाया था
समय की आंधी ऐसी चली
दूसरे घर की रंगोली
में वह घुलमिल गई
तब से
होली को लेकर जब भी
बैठती हूँ लिखने कविता
लिख बैठती हूँ जीवन की कविता
जीवन होली से अलग कभी
दिखा ही नहीं मुझे
कौन सा रंग नहीं है इसमें
होली का रंग तो धूल जाता है
जीवन का रंग जैसे जैसे चढ़ता है
अनुभव परिपक्व बनता जाता है
