इल्म
इल्म
आईना आज मुझे अपनी हकीक़त से रूबरू कराने लगा,
सारे बेतरतीब राब्ता से हमें आहिस्ता से रूबरू कराने लगा।
कसीदे पढ़ते थे जो कभी हमारी हसीन मुलाकातों के,
लफ़्ज़ों से बिखेर कर हमें उधडे रिश्तों से रुबरु कराने लगा।
हमने भी दिल में उम्मीद के चिरागों को जलाए रखा,
खिड़कियाँ दिल की खोल फकत राहों से रुबरु कराने लगा।
इल्म नहीं था हमें यकीनन उनकी इरादों का कभी,
मुकद्दर का खेल रफ्ता रफ्ता मुझे जिंदगी से रुबरु कराने लगा।
बुझ गया " राज" का दिल बदली की चादर ओढ रुठ गया,
न हारे हम इश्क के इल्म से दिल हमें मंज़िल से रूबरू कराने लगा।
