हां मैं कवयित्री हो गई
हां मैं कवयित्री हो गई
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अपनी कलम से कर ली मोहब्बत मैंने
और इसकी इबादत कर ली मैंने
हां मैं कवयित्री हो गई
नहीं पड़ती हूं मैं अब
तेरी तीन, मेरी पांच में
हां अब बेफिक्र सी हो गई हूँ मैं
दुनिया के झंझटों से दूर हो गई हूँ मैं
हां मैं कवयित्री हो गई
बनाती हूँ अपना स्वच्छंद आकाश
बुनती हूं सपने सुनहरे उसमें
लगाती हूं स्वयं को कल्पनाओं के पर
हां मैं कवयित्री हो गई
मेरी तरसाई आंखों को
अब उसकी मंजिल मिल गई है
मेरी कलम ही मेरी सखी बन गई है
हां मैं कवयित्री हो गई
