गरीबी में ईश्वर की मार
गरीबी में ईश्वर की मार
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गरीबी भी अनचाहे वार चलाती है,
ऊपर से महंगाई भी कमर तोड़ जाती है,
प्रकृति भी इसका क्या खूब साथ निभाती है,
गर्मी की तपन हर रोज जलाती है,
बरसातों की वो रातें छत से पानी टपकाती है,
रात भर जाग कर सुबह सुलाती है,
सर्दी भी तो खूब हाहाकार मचाती है,
गरीब को गरीब होने का एहसास हर रोज दिलाती है,
यह दिन भी जैसे तैसे कट जाएगा,
हे भगवान तू हमें और कितना सताएगा,
बचा हुआ नरक क्या धरती पर ही दिखाएगा?
