गजल
गजल
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जो आबाद है अपने घरों में उनकी सब नुमाइश करते है
पर जिनके लूट गए आशियाने उन्हें कौन याद करते है
बिखर जाती है जिंदगीयाँ एक छोटा आशियाना बनाने में
मुफलिसी के झोंपड़ों की दुआही को कौन याद करते है
बड़े ही सूकूँ से सो रहे है अब वो अपने महलों में
जिसने बनाने में काट दी कई रातें उन्हें कौन याद करते है
ये वो रंगमंच है साहब जिसमें नुमाइश करने की रवायत है
बड़े मुंह से छोटों की वाह - वाही कौन याद करते है
जाने क्यूँ इतराते है कुछ लोग आज भी अपनी अना पर
जेब खाली हो उस शख्स की तौहीन कौन याद करते है
चाँद, सूरज, अम्बर, धरा पर ग़ज़ल लिखना शौक है सबका ,
मुफलिसी पर लिखी गई ग़ज़ल 'काजल' कौन याद करते है।
