धर अपनी मंजिल
धर अपनी मंजिल
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धर मंजिल अपनी
कर साबित खुद को,
क्यों आस लगाये बेठे हो
आती हैं कई काँटों की राहें
पर बना उत्साह की तीखी एक धार
और काट दे उन काँटों की राहों को
फिर चल ,वापस चल
कर दिखा , और
धर मंजिल अपनी।
