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Dr Mousumi Parida

Others

4.0  

Dr Mousumi Parida

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धारा , रंग, मैं

धारा , रंग, मैं

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१। ...धारा 

भागती- भागती हुई ..

काटती, बिखरती हुई 

एक ही नाद और चाह के साथ 

बेखौफ और बेझिझक 

उनसे मिलने चल पड़ी है जो.. ॥


२। ..रंग

भेद-भाव से बेखबर

अपने ही रंग में रंगने को तत्पर 

तन मन को छू जाए

जैसे हर तरफ उसी का मंजर।


३। ..मैं 

धारा जैसी बहचली उनसे मिलने 

तरसती , चिल्लाती, छीलती !

पल पल जागती , टूट के बिखरती ,

अपनी धुन से मगन, 

मिलन को तरसती हुई मैं उन्ही के जोगन ॥


रंग की धारा लिए , रंग लूं उन्हें  

समा जाऊँ उनसे ..

श्याम रंग बनके , श्याम अंग से ॥


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