दादी की पसंदीदा कविता
दादी की पसंदीदा कविता
दादी-दादी मेरी कविता सुनो
मेरे लिखे पन्नो को देखो और सुनो
अनपढ़ थी पर खुश थी दादी
खटिया पर बैठ कहने लगी
मै नही पढ़ती तुम ही कहो।
सुनाने से पहले कहती दादी
तू पढ़ता-लिखता स्कूल में
तू तो हो रहा है कवितावादी
सुना जरा मैं भी तो सुनू
ऐसी कौनसी कविता है
जो मैं सब से कहूँ
क्या कहेगी दादी सोच रहा था
मैं पहले हँसा और फ़िर कह रहा था
अच्छा सुनो।
आओ बच्चो पेड़ लगाये
आओ बच्चो पेड़ लगाये
पेड़ है तो खुशियां है
खट्टे-मीठे फल देता है
पेड़ हमें फूल और
हरी-हरी सब्जी देता है
तो बच्चो आओ पेड़ लगाये
आओ बच्चो पेड़ लगाये
पेड़ घर में होगा तो
तो छाया भी मिलेगी
पेड़ को पानी पिलाय करो
अच्छे अच्छे फल खाया करो
तो बच्चो आओ पेड़ लगाये
आओ बच्चो पेड़ लगाये।
इस तरह कविता
सुन-सुनकर दादी खुश होती थी
दादी खुश होती थी
मैं खुश होता था
मैं खुश होता था तो
मैं सबको कविता सुनाता था
दादी को कविता पसंद आई
इसी तरह बार बार सुनकर
उनके जी में आई
क्यू ना सुनू इसे बार बार
फ़िर सबको सुनाऊ हजार बार
एक बार नही हजार बार।
दादी को कविता याद हो गई
मेंरे नाम की बात हो गई
अब समझो कि कविता क्या है
बच्चो को सुनाते हुए रात हो गई
कविता है तो खुशियाँ है
अपनो के संग मस्तियाँ है
रोज सुनाती दादी-नानी
ऐसी हम लोगों की बस्तियां है।
