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Priyanka Jhawar

Others


4.3  

Priyanka Jhawar

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दादा दादी और पोता

दादा दादी और पोता

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रिश्ते रहते हैं रिश्ते, जब जुड़े रहते हैं खून से।

रिश्ते बन जाते हैं पूजा, जब जुड़ जाते हैं रूह से।।


जिस पूजा रूपी रिश्ते की हो रही हैं बात, उसमें है दादा-दादी पोता।

इस तरह मत चौंकिए, यह पन्ना पढ़कर जानिए, ऐसा कैसे हैं होता।।


देरी ना होने दी किसी बात में, दादा-दादी ने पोते को बड़े नाजों से पाला।

अंधेरी रातों में ही नहीं, उनके उजियारे दिन में भी हैं इस दीपक से उजाला।।


जहां हमारी दादी को, सुनाई नहीं देता कभी-कभी हम कितना भी चिल्लालें।

वहां उसी बई को, सुनाई दे जाते हैं झट से अपने दीपक के ख़ामोशी वाले इशारें।।


यह तो सच है कि होते हैं भगवान, मगर वो होकर भी होते हैं अंजान।।

इस पोते के जीवन में बई-बाऊजी दादा-दादी की नहीं, उस विधाता की है पहचान।।


सुना रखा था अब तक भजन में कि, भगत के वश में होते हैं भगवान।

देख लिया वो जीवन में भी, जब भगवानजी(दादाजी) ने बना दिया अपने भगत को ही राम।।


ये दोनों भगवान, अपने भगत पर मरते हैं, अपने सारे काम उससे पूछ-पूछकर करते हैं।

इतना ही नहीं लीला हैं इनकी एसी कि, उसे डराने की बजाय खुद ही उससे डरते हैं।।


भगत भी है दीवाना, कभी समझाता है हंसाता हैं और कुछ भी बोलता है।

कभी डराकर रूलाता हैं, और उसके बाद खुद भी छुप-छुपकर रोता है।।


सभी अब गौर फरमाइएगा, एक बार अजब हुआ था।

अजी़ अब गौर फरमाइएगा, दूसरी बार गजब हुआ था।


अजब हुआ था जब - भगवानजी के दिल के संकट‌ समय में, सुध-बुध खोकर उनका राम पहुंचा था उनके पास में।

गजब हुआ था जब - भगवानजी के अंत समय में, खुद-ब-खुद वह पहुंच गए थे अपने रामके पास में।।


होता अगर मुमकिन तो ये तीनों, फाड़कर दिखा देते अपनी छाती।

बसते हैं एक-दूसरे के मन में तीनों, बनकर एक-दूसरे के दीपक-बाती।।


साथ होने की जरूरत नहीं, एक-दूसरे की मन की बात जान लेते हैं दूर से।

सच कहती हूं, इनका रिश्ता अब सिर्फ खून का या दिल का नहीं, बल्कि जुड़ गया हैं रूह से।।


प्रणाम करियेगा इनके नाम, अगर आपको सही लगा हो नाम इस रिश्ते का, जो रखा है मैंने पूजा।

और अगर नहीं लगा हो, तो बेझिझक सुझाईयेगा इसके लिए नाम दूजा।।


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