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Sapna M Goel

Others

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Sapna M Goel

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छत वो बचपन वाली

छत वो बचपन वाली

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बचपन में जब कट कर 

किसी दूसरे की छत पर पहुंच जाती थी पतंग हमारी

तो हम लाने को उसको किसी का दरवाज़ा नहीं खटखटाते थे

लगाते थे एक छत से दूसरी..दूसरी से तीसरी छत पर छलांग 

और अपनी पतंग हम ले आते थे

उन दिनों बराबर सी ही होती थी सबकी दीवारें लगभग

और पूरा मौहल्ला एक परिवार जैसा ही होता था

इजाजत नहीं लेनी पड़ती थी किसी की

छत पर से ही छलांग लगाकर 

एक दूसरे के घर के अंदर पहुंच जाते थे

अब परिवार ही परिवार नहीं...किसी की छत बराबर नहीं

सब के दरवाजे हो चुके हैं बंद...

कोई करता किसी के मन में तांक झांक नहीं।


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