बसंती बयार
बसंती बयार
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झीलें चुप थीं और
पगडंडियाँ खामोश,
गुनगुनी धूप भी
चैन से पसरी थी,
अचानक धूप को
धक्का मार कर
घुस आयी थी,
अल्हड़ बसंती बयार
मौन शयनकक्ष में,
अलसाई सी रजाई
बेमन सी सिमटकर
दुबक गई थी मन में,
अधखुले किवाड़ की
लटकी निष्पक्ष सांकल
उछलकर गिर गई
थी उदास देहरी पर,
हालांकि मौसम
डाकिया बनकर
खत दे गया था बसंत का,
